फाल्गुन की दस्तक के साथ जिन जंगलों में कभी अंगारों-सी लालिमा बिखर जाती थी, वहां इस बार सन्नाटा पसरा है। Badaun के कादरचौक क्षेत्र में सैकड़ों एकड़ में फैले पलाश वन इस बार टेसू के फूलों से खाली हैं। बसंत के प्रतीक माने जाने वाले इन चमकीले नारंगी-लाल फूलों के बिना जंगल वीरान और उदास दिखाई दे रहे हैं।
ग्रामीणों और बुजुर्गों का कहना है कि लंबे समय बाद फाल्गुन में ऐसा सूना नजारा देखने को मिला है। हर साल होली से पहले पलाश के पेड़ पूरी तरह खिल उठते थे और जंगल दूर से ही दहकते नजर आते थे, लेकिन इस बार पेड़ों पर फूल न के बराबर हैं। मौसम में बदलाव और असामान्य तापमान को इसकी एक वजह माना जा रहा है।
पलाश के फूलों से स्थानीय स्तर पर प्राकृतिक रंग तैयार किए जाते हैं, जिनकी मांग होली के समय बढ़ जाती है। हर साल इन फूलों के सहारे लाखों रुपये का कारोबार होता था। जंगल से फूल तोड़कर सुखाए जाते थे और फिर उनसे हर्बल रंग बनाया जाता था, जिससे कई परिवारों की आजीविका जुड़ी रहती थी।
इस बार फूल नहीं खिलने से कारोबार पर भी असर पड़ा है। जिन लोगों ने पिछले वर्ष के सूखे फूल संभालकर रखे थे, वही अब उनसे रंग बनाने की तैयारी कर रहे हैं। स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में मौसम अनुकूल रहा तो फिर से पलाश वन अपनी पुरानी लालिमा के साथ फाल्गुन का स्वागत करेंगे।


