हर सप्ताह, एक साहसिक पड़ाव, एक सच्ची कहानी

साल 2006ज्नेपाल की सडक़ों पर सन्नाटा भी था और आक्रोश भी। सत्ता अपने चरम पर थी, विरोध उबाल पर था।हर कदम पर तनावज् हर गली में बेचैनीज्वह दौर था नेपालसे सिविल वार के अंतिम चरण और जाना आंदोलन ढ्ढढ्ढ की प्रचंड जनलहर का। देश राजनीतिक विस्फोट के मुहाने पर खड़ा था। सडक़ों पर कर्फ्यू, चौक-चौराहों पर बंदूकें, और जनता के मन में परिवर्तन की आग और उसी दौर मेंज्यूथ इंडिया की टीम नेपाल पहुँची थी तब हम महज़ 25 वर्ष के थे।
यह हमारे लिए सिर्फ एक कवरेज नहीं था —यह इतिहास के बीच खड़े होकर सच को दर्ज करने का साहस था। नेपाल की संवेदनशील परिस्थितियों को देखते हुए हमें वहाँ की सत्ता द्वारा सुरक्षा कवर दिया गया। जब हालात इतने गंभीर हों कि हर कदम जोखिम भरा हो, और उसी वक्त आपकी कलम को सुरक्षा दी जाए —तो समझ लीजिए आपकी पत्रकारिता सिर्फ खबर नहीं, प्रभाव बन चुकी है।सुरक्षा कर्मियों के बीच खड़े होकर,हमने आंदोलन की आवाज़ सुनीज्सत्ता की रणनीति देखीज्और जनता की धडक़न महसूस की। सन्नाटे में गूंजते नारे, सशस्त्र जवानों की पैनी निगाहें, राजनीतिक हलचल की तीव्रता, और कैमरे के सामने खड़ा सच, वह दिन आज भी रोंगटे खड़े कर देता है।उस दिन एहसास हुआ पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, जोखिम उठाने का नाम है।
सच लिखना आसान नहीं होता, लेकिन सच से पीछे हटना उससे भी कठिन होता है।इतिहास गवाह है जब हालात कठिन थे,जब माहौल विस्फोटक था,जब कई लोग दूरी बनाए हुए थे तब भी यूथ इंडिया मौके पर मौजूद था।
प्रस्तुति: यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप

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