लखनऊ के आशियाना क्षेत्र में हुई हालिया घटना ने केवल एक परिवार को नहीं, बल्कि पूरे समाज को झकझोर दिया है। पिता की हत्या, वह भी अपने ही पुत्र के हाथों—और उसके बाद कथित रूप से साक्ष्य मिटाने के प्रयास—यह सब किसी भी सभ्य समाज के लिए गहरी चिंता का विषय है। यह मामला अदालत में है और अंतिम सत्य न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएगा, लेकिन जो तथ्य अब तक उजागर हुए हैं, वे हमें आत्ममंथन के लिए विवश करते हैं।
भारतीय समाज की मूल इकाई परिवार रहा है। यही वह स्थान है जहां बच्चे बोलना सीखते हैं, व्यवहार सीखते हैं, सही-गलत की समझ विकसित करते हैं। किंतु बदलते शहरी जीवन, व्यस्त दिनचर्या और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने परिवारों के भीतर संवाद को कम कर दिया है।
आज माता-पिता और संतानों के बीच बातचीत का समय घटता जा रहा है, जबकि अपेक्षाओं का बोझ बढ़ता जा रहा है। पढ़ाई, करियर, प्रतियोगी परीक्षाओं और सामाजिक प्रतिष्ठा की दौड़ में कई बार भावनात्मक संतुलन पीछे छूट जाता है। जब संवाद की जगह दबाव ले लेता है, तो रिश्तों में तनाव पनपने लगता है।
हम अपने बच्चों को श्रेष्ठ अंक लाने, बड़ी नौकरी पाने और आर्थिक रूप से सफल होने की सीख तो देते हैं, लेकिन क्या उतनी ही गंभीरता से हम उन्हें धैर्य, सहनशीलता, आत्मसंयम और असहमति को शांति से सुलझाने का संस्कार दे पा रहे हैं?
संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं होते; वे व्यवहार में दिखाई देते हैं—बड़ों के प्रति सम्मान, क्रोध पर नियंत्रण, असफलता को स्वीकार करने की क्षमता और संवाद से समाधान निकालने की प्रवृत्ति। यदि ये मूल्य कमजोर पड़ते हैं, तो शिक्षा और संसाधन भी मनुष्य को संवेदनशील नहीं बना पाते।
प्रतिस्पर्धी माहौल में युवा वर्ग पर मानसिक दबाव अत्यधिक है। परीक्षा, करियर, सामाजिक तुलना और पारिवारिक अपेक्षाएं मिलकर एक अदृश्य तनाव पैदा करती हैं। दुर्भाग्य से हमारे समाज में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा अब भी कम होती है।
यदि परिवार के भीतर असंतोष, गुस्सा या अवसाद के संकेत समय रहते पहचाने जाएं और परामर्श या संवाद का सहारा लिया जाए, तो कई त्रासदियों को रोका जा सकता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि भावनात्मक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शारीरिक स्वास्थ्य।
कानून और सामाजिक जिम्मेदारी
किसी भी परिस्थिति में हिंसा का कोई औचित्य नहीं हो सकता। कानून स्पष्ट है—हत्या और साक्ष्य मिटाने जैसे अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान है। लेकिन केवल कानूनी दंड से समाज नहीं सुधरता; सामाजिक चेतना और नैतिक शिक्षा भी आवश्यक है।
समाज, पड़ोस, शैक्षणिक संस्थान—सभी की भूमिका है कि वे संवेदनशीलता और नैतिकता को बढ़ावा दें। यदि पड़ोस और समुदाय में आपसी संवाद मजबूत हो, तो कई बार तनाव की स्थितियां समय रहते पहचानी जा सकती हैं।
हमें क्या सीखना चाहिए?
परिवार में नियमित संवाद – केवल आदेश या अपेक्षा नहीं, बल्कि खुली बातचीत।संस्कारों की पुनर्स्थापना – धैर्य, संयम और सहिष्णुता को व्यवहार में उतारना।
मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान – तनाव के संकेतों को नजरअंदाज न करना।कानून के प्रति सम्मान – यह स्पष्ट संदेश कि अपराध का कोई औचित्य नहीं।
आशियाना की यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि सामाजिक चेतावनी है। यदि हम अब भी नहीं चेते, तो रिश्तों की दरारें और गहरी हो सकती हैं।
समय आ गया है कि हम सफलता की परिभाषा को केवल आर्थिक उपलब्धियों तक सीमित न रखें, बल्कि अच्छे संस्कार, संवेदनशीलता और पारिवारिक सामंजस्य को भी उतना ही महत्व दें। क्योंकि जब घर सुरक्षित और संतुलित होगा, तभी समाज भी मजबूत और स्वस्थ बन सकेगा।
जब घर ही असुरक्षित हो जाए: आशियाना कांड और सामाजिक संस्कारों पर गंभीर प्रश्न


