– पीएम मोदी नें खुद इंतजार कर बढ़ाया प्रदेश अध्यक्ष का यूपी के राजनैतिक कद
शरद कटियार
राजनीति में दृश्य अक्सर शब्दों से ज्यादा प्रभावी होते हैं। हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ऐसा ही एक क्षण सामने आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ समय तक केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी के आने की प्रतीक्षा करते दिखाई दिए। मंच के समीप मौजूद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वाहन के बाहर खड़े रहे और प्रधानमंत्री पंकज चौधरी के आगमन का इंतजार करते रहे। यह पूरा घटनाक्रम भले ही दो मिनट का रहा हो, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसकी व्याख्या लंबी हो रही है।
प्रश्न यह है कि क्या यह महज संयोग था या एक सुनियोजित राजनीतिक संदेश?
भारतीय राजनीति में प्रतीकों का गहरा महत्व है। किसी नेता का सार्वजनिक रूप से इंतजार करना या उसे प्राथमिकता देना, उसके कद को स्वीकार करना माना जाता है। पंकज चौधरी उत्तर प्रदेश की राजनीति में ओबीसी समुदाय के प्रभावशाली चेहरे के रूप में जाने जाते हैं। पूर्वांचल में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। ऐसे में प्रधानमंत्री द्वारा उनका इंतजार करना कई विश्लेषकों के अनुसार सामाजिक संतुलन का संकेत भी हो सकता है।
2024 के लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश का राजनीतिक गणित और भी संवेदनशील हो गया है। 2027 का विधानसभा चुनाव पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न होगा। ऐसे में ओबीसी नेतृत्व को सार्वजनिक रूप से महत्व देना एक व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
घटनाक्रम के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी ने चर्चाओं को और हवा दी। हालांकि सरकार और संगठन के बीच किसी प्रकार के मतभेद का कोई आधिकारिक संकेत नहीं है, फिर भी राजनीतिक विश्लेषक इस दृश्य को शक्ति संतुलन के संदर्भ में देख रहे हैं।
भाजपा की राजनीति में केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका निर्णायक मानी जाती है। प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की रणनीतिक शैली अक्सर संकेतों के माध्यम से संदेश देने की रही है। ऐसे में पंकज चौधरी की प्रतीक्षा को कई लोग संगठनात्मक संतुलन के संकेत के रूप में पढ़ रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में सामाजिक समीकरणों की जटिलता किसी से छिपी नहीं है। पिछड़ा वर्ग, दलित, सवर्ण और क्षेत्रीय संतुलन—इन सभी को साधना चुनावी सफलता की कुंजी है। यदि इस घटना को व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह संदेश भी हो सकता है कि पार्टी 2027 के लिए हर वर्ग के नेतृत्व को साथ लेकर चलने का संकेत दे रही है।
दो मिनट की प्रतीक्षा को लेकर जितनी चर्चा हो रही है, उतनी शायद उस कार्यक्रम के भाषणों की नहीं हुई। यही राजनीति की शक्ति है,हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे सामान्य प्रोटोकॉल बताया जा रहा है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषण में यह दृश्य 2027 की पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है। आने वाले समय में यदि संगठनात्मक फेरबदल या रणनीतिक बदलाव सामने आते हैं, तो यह क्षण एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में याद किया जा सकता है।
राजनीति में कभी-कभी दो मिनट भी इतिहास लिख देते हैं।
लेखक यूथ इंडिया न्यूज़ ग्रुप के संस्थापक और ग्रुप एडिटर हैँ।





