आठ महीने की एक मासूम… जिसने अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा था, जिसने शब्दों में अपनी भावनाएं व्यक्त करना भी शुरू नहीं किया था—वही बच्ची आज विश्व की सबसे कम उम्र की अंगदाता के रूप में मानवता के इतिहास में दर्ज हो गई। आलिन शेरिन अब्राहम का नाम अब केवल एक परिवार की स्मृति नहीं, बल्कि समाज के लिए एक नैतिक प्रश्न और प्रेरणा दोनों बन चुका है।
सड़क दुर्घटना ने एक घर की खुशियां छीन लीं। एक मां की गोद सूनी हो गई, एक पिता का कंधा झुक गया। लेकिन इसी असहनीय पीड़ा के बीच जो निर्णय लिया गया, वह साधारण नहीं था। अपने व्यक्तिगत शोक से ऊपर उठकर अपनी बेटी के अंग दान करने का फैसला—यह केवल चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवेदना का सर्वोच्च रूप है।
शोक से सेवा तक की यात्रा
किसी भी माता-पिता के लिए यह कल्पना करना भी कठिन है कि वे अपने बच्चे को खोने के बाद समाज के हित में सोच सकें। लेकिन आलिन के माता-पिता ने यही किया। उन्होंने यह स्वीकार किया कि यदि उनकी नन्ही परी की धड़कनें किसी और की जिंदगी में बस सकती हैं, तो उसका जीवन व्यर्थ नहीं जाएगा।
अक्सर हम अंगदान को एक नैतिक कर्तव्य के रूप में सुनते हैं, लेकिन व्यवहार में यह निर्णय अत्यंत कठिन होता है। भावनाएं, सामाजिक धारणाएं, धार्मिक भ्रम और जानकारी का अभाव—ये सभी कारक लोगों को पीछे खींचते हैं। ऐसे में इस परिवार का साहस समाज के लिए एक जीवंत उदाहरण है।
क्या हम तैयार हैं ऐसे निर्णय के लिए?
भारत में हर वर्ष हजारों मरीज अंग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा सूची में रहते हैं। आंकड़े बताते हैं कि मांग और उपलब्धता के बीच भारी अंतर है। कई लोग केवल इसलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि समय पर दाता नहीं मिल पाता।
ऐसे परिदृश्य में आलिन शेरिन अब्राहम की कहानी हमें आईना दिखाती है। क्या हम भी ऐसे क्षण में समाज के बारे में सोच पाएंगे? क्या हम अपने दुःख से ऊपर उठकर किसी अजनबी को जीवन देने का साहस जुटा पाएंगे?
सम्मान से अधिक, यह एक संदेश है
केरल सरकार द्वारा माता-पिता को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ देना केवल औपचारिक सम्मान नहीं था। यह समाज को एक स्पष्ट संकेत था कि अंगदान महादान है, और जो लोग यह निर्णय लेते हैं, वे केवल अपने परिवार के नहीं, बल्कि पूरे समाज के हितैषी होते हैं।
लेकिन प्रश्न यह भी है कि क्या सम्मान समारोहों से आगे बढ़कर हम स्थायी जागरूकता अभियान चला पा रहे हैं? क्या स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं में अंगदान को लेकर व्यवस्थित संवाद हो रहा है?
एक छोटी उम्र, एक बड़ा संदेश
आलिन की जिंदगी लंबी नहीं थी, लेकिन उसका प्रभाव गहरा है। वह यह सिखा गई कि जीवन की सार्थकता उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसके योगदान में है।
आज जरूरत है कि हम इस घटना को केवल भावुक कहानी के रूप में न देखें, बल्कि इसे सामाजिक परिवर्तन का आधार बनाएं। अंगदान को लेकर मिथकों को तोड़ा जाए, पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए और परिवारों को सही समय पर सही जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
नन्ही परी आलिन शेरिन अब्राहम अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी मासूम मुस्कान उन जिंदगियों में धड़क रही है, जिन्हें उसने जीवन का दूसरा अवसर दिया।
यह संपादकीय केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि समाज से एक अपील है—जब भी जीवन और मृत्यु के बीच निर्णय का क्षण आए, इंसानियत को चुनिए।

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