
शरद कटियार
‘क्षितिज के पार’ केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह उस इंसान की जीवंत यात्रा है जिसने गांव की सीमाओं से निकलकर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक अपने हौसलों का परचम लहराया। इस पुस्तक के लेखक रविंद्र कुमार वर्तमान में आज़मगढ़ के जिलाधिकारी हैं और दो बार माउंट एवरेस्ट फतह करने वाले विरले भारतीयों में शामिल हैं। उनका प्रशासनिक जीवन जितना अनुशासित है, उतना ही उनका पर्वतारोहण जीवन साहस और आत्मविश्वास से भरा हुआ।
कहानी सिर्फ़ पहाड़ की नहीं, इंसान की है
‘क्षितिज के पार’ को अगर केवल जहाजों और जहाज़ी रोमांच की कहानी समझा जाए, तो यह पुस्तक के साथ अन्याय होगा। यह किताब मानवीय अनुभवों, संघर्षों और आत्ममंथन की यात्रा है। लेखक हमें बताता है कि ऊंचाई केवल पर्वतों की नहीं होती, ऊंचाई सोच की भी होती है।
पुस्तक में लेखक अपने अनुभवों के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि असफलता, डर और अकेलापन ये सब मंज़िल की राह के साथी होते हैं, बाधा नहीं।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी ताकत इसकी ईमानदारी है। लेखक न तो अपने संघर्ष को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं और न ही सफलता को चमकदार शब्दों में लपेटते हैं। वे बताते हैं कि कैसे एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर प्रशासनिक सेवा और पर्वतारोहण दोनों में संतुलन बनाना संभव है, बशर्ते संकल्प स्पष्ट हो।
रविंद्र कुमार का लेखन यह साबित करता है कि एक आईएएस अधिकारी केवल फाइलों तक सीमित नहीं होता। उनकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय है। हर अध्याय पाठक को यह महसूस कराता है कि लेखक सामने बैठकर अपने अनुभव साझा कर रहा है बिना उपदेश, बिना भारी शब्दों के।
यह पुस्तक खास तौर पर युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।
जो युवा संसाधनों की कमी को अपनी असफलता का कारण मानते हैं, उनके लिए ‘क्षितिज के पार’ एक सीधा संदेश है कि सीमाएं बाहर नहीं, भीतर होती हैं।
यह किताब बताती है कि सपने देखना काफी नहीं, उन्हें जीने का साहस भी चाहिए।
‘क्षितिज के पार’ एक ऐसी पुस्तक है जो आत्मविश्वास जगाती है
डर से दोस्ती करना सिखाती है
और यह भरोसा दिलाती है कि साधारण इंसान भी असाधारण ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है
यह किताब हर उस व्यक्ति को पढ़नी चाहिए जो अपने जीवन में किसी न किसी मोड़ पर रुक गया है।
रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐½ (4.5/5)
— एक ऐसी किताब, जो पाठक को उसके अपने “क्षितिज” से आगे देखने का साहस देती है।






