भरत चतुर्वेदी
इस सृष्टि को अगर आप लगातार शंका की नज़र से समझने की कोशिश करेंगे, तो सच यह है कि आप जितना आगे बढ़ेंगे, उतने ही ज़्यादा उलझते जाएंगे। एक सवाल का जवाब मिलेगा, तो उससे बड़े चार सवाल खड़े हो जाएंगे। यह इसलिए नहीं होता कि सृष्टि गलत है, बल्कि इसलिए होता है कि शंका कभी तृप्त नहीं होती।
शंका पूछती रहती है ईश्वर है या नहीं? आत्मा है या नहीं? जीवन का कोई अर्थ है या नहीं? और हर जवाब के बाद कहती है—“ठीक है, लेकिन यह भी साबित करो।” अगर आप हर चीज़ को केवल तर्क की कसौटी पर ही तौलना चाहते हैं, तो ईमानदारी से एक कदम और आगे बढ़िए—नास्तिक बन जाइए।
अनीश्वरवादी बन जाइए। या साफ़ कह दीजिए कि सब कुछ शून्य है। यह रास्ता गलत नहीं है। यह भी एक ईमानदार रास्ता है। लेकिन इसमें एक सच्चाई स्वीकार करनी पड़ेगी—इस रास्ते में जीवन का अर्थ नहीं मिलता।
अगर सब कुछ संयोग है, तो फिर प्रेम, त्याग, करुणा और बलिदान सिर्फ़ रासायनिक क्रियाएं बनकर रह जाती हैं।यह दृष्टि बुद्धि को संतुष्ट कर सकती है, लेकिन हृदय को खाली छोड़ देती है। बहुत लोग इसके उलट रास्ता चुनते हैं।जो कहा गया, वही मान लिया। प्रश्न पूछना छोड़ दिया।तर्क से डरने लगे। यह रास्ता भी आसान है, लेकिन इसमें खतरा यह है कि यहां सोच मर जाती है। यह श्रद्धा नहीं, बल्कि आदत बन जाती है।ऐसी आस्था समाज को आगे नहीं बढ़ाती, बल्कि जड़ बना देती है। अब बात उस रास्ते की, जो सबसे कठिन है—लेकिन सबसे संतुलित भी।इस रास्ते में आप आंखें बंद नहीं करते। आप सब कुछ देखते हैं। आप सवाल भी पूछते हैं। लेकिन आप हर चीज़ को खारिज करने की जल्दी नहीं करते।
यह रास्ता कहता है— पहले समझो, फिर अनुभव करो, और उसके बाद निष्कर्ष निकालो,यह न अंधविश्वास है, न नकार। यह अनुसंधान के साथ विश्वास है। सत्य बहस से नहीं, अनुभव से मिलता है।
सत्य किसी किताब, मंच या बहस से नहीं मिलता।वह तब मिलता है, जब इंसान दुख में टूटकर भी संवेदनशील रहता है,सुख में अहंकार से बचता है, और जीवन को पूरी ईमानदारी से जीता है।जो लोग केवल शंका में जीते हैं, वे कभी टिक नहीं पाते।जो लोग केवल मान्यता में जीते हैं, वे कभी बढ़ नहीं पाते।
लेकिन जो लोग समझते हुए भरोसा करना सीख लेते हैं,वही धीरे-धीरे सत्य के करीब पहुंचते हैं।
सीधी बात या तो साफ़-साफ़ नकार दीजिए—और फिर अर्थहीनता को स्वीकार कर लीजिए।या फिर आंखें खुली रखकर, मन शांत करके,जीवन को गहराई से समझने की कोशिश कीजिए।क्योंकिसृष्टि शंका से नहीं, संवेदना से खुलती है।





