अजय कटियार
शिक्षा को कभी समाज का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता था। यही शिक्षा व्यक्ति को सोचने, समझने और आगे बढ़ने की ताकत देती थी। लेकिन आज वही शिक्षा आम आदमी के लिए सबसे महंगी और जटिल जरूरत बनती जा रही है। सरकारी स्कूलों की गिरती गुणवत्ता और निजी संस्थानों की बेलगाम फीस ने अभिभावकों और छात्रों दोनों को असमंजस और तनाव की स्थिति में ला खड़ा किया है।
एक ओर सरकारें “शिक्षा सबके लिए” का नारा देती हैं, तो दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत यह है कि अच्छी शिक्षा अब केवल वही हासिल कर पा रहा है, जिसके पास संसाधन और पैसा है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और पढ़ाई का कमजोर स्तर लोगों को मजबूरी में निजी स्कूलों की ओर धकेल देता है।
निजी स्कूल और कॉलेज अब शिक्षा संस्थान कम और व्यवसायिक प्रतिष्ठान अधिक बनते जा रहे हैं। प्रवेश के समय फीस, फिर किताबें, यूनिफॉर्म, ट्रांसपोर्ट, एक्टिविटी चार्ज, परीक्षा शुल्क और न जाने कितने नामों से वसूली—इन सबने शिक्षा को एक भारी आर्थिक बोझ बना दिया है। मध्यम और निम्न वर्ग के परिवार बच्चों के भविष्य के नाम पर कर्ज लेने को मजबूर हैं।
स्थिति उच्च शिक्षा में और भी चिंताजनक हो जाती है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट और प्रोफेशनल कोर्सेज की फीस आम परिवार की पहुंच से बाहर हो चुकी है। सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सीटें सीमित हैं, जबकि निजी कॉलेजों में फीस आसमान छू रही है। ऐसे में योग्यता से अधिक पैसा निर्णायक बनता जा रहा है।
कोचिंग संस्कृति ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी अब पढ़ाई नहीं, बल्कि महंगे कोचिंग पैकेज पर निर्भर होती जा रही है। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्र इस दौड़ में पीछे छूट जाते हैं, चाहे उनमें प्रतिभा कितनी ही क्यों न हो।
इस शिक्षा व्यवस्था का सबसे खतरनाक असर सामाजिक असमानता के रूप में सामने आ रहा है। अमीर और गरीब के बीच की खाई शिक्षा के जरिए और चौड़ी हो रही है। जब शिक्षा समान अवसर नहीं दे पाएगी, तो समाज में समानता और न्याय की बात केवल कागजी बनकर रह जाएगी।
शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि सोच विकसित करना और समाज को बेहतर बनाना है। लेकिन बाज़ारीकरण ने शिक्षा को डिग्री और पैकेज तक सीमित कर दिया है। इससे मूल्य, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी पीछे छूटती जा रही है।
अब समय आ गया है कि शिक्षा को फिर से जनकल्याण का माध्यम बनाया जाए।
सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की गुणवत्ता सुधारना, शिक्षकों की पर्याप्त नियुक्ति करना, निजी संस्थानों पर सख्त नियमन और फीस नियंत्रण बेहद जरूरी है। साथ ही, हर छात्र को उसकी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने का समान अवसर मिलना चाहिए।
अगर शिक्षा को मुनाफे का साधन ही बने रहने दिया गया, तो देश प्रतिभा से नहीं, केवल संसाधनों से आगे बढ़ेगा—और यह किसी भी समाज के लिए खतरनाक संकेत है।
शिक्षा जितनी सस्ती और सुलभ होगी, समाज उतना ही मजबूत और न्यायपूर्ण बनेगा।
लेखक, मध्य प्रदेश मे शिक्षा विद हैं।

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