लखनऊ| नगर निगम की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। विकास कार्यों के लिए तय की जाने वाली योजनाओं और कामों की सूची समय पर अंतिम रूप न ले पाने के कारण नगर निगम चालू वित्तीय वर्ष में बेहद सीमित खर्च ही कर सका। हालात यह रहे कि पूरे वर्ष में नगर निगम केवल करीब दो करोड़ रुपये ही खर्च कर पाया। इस गंभीर प्रशासनिक और वित्तीय नाकामी का सीधा असर यह हुआ कि शासन ने नगर निगम की लगभग 330 करोड़ रुपये की बड़ी ग्रांट पर रोक लगा दी है।
यह स्थिति प्रमुख सचिव नगर विकास पी. गुरुप्रसाद की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में सामने आई। बैठक के दौरान नगर विकास विभाग के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि लखनऊ नगर निगम को अन्य नगर निगमों की तरह नई ग्रांट जारी नहीं की जा सकी है। इसकी मुख्य वजह यह है कि पिछले वित्तीय वर्ष में अवस्थापना निधि और 15वें वित्त आयोग से प्राप्त धनराशि के खर्च का विवरण और यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट (यूसी) अब तक शासन को उपलब्ध नहीं कराया गया है।
अधिकारियों के मुताबिक, शासन के नियमों के अनुसार जब तक पिछली धनराशि के उपयोग की पूरी रिपोर्ट समय से प्रस्तुत नहीं की जाती, तब तक अगली किस्त या नई ग्रांट जारी नहीं की जा सकती। लखनऊ नगर निगम द्वारा खर्च की रिपोर्ट न भेजे जाने से यह संदेश गया कि उपलब्ध धनराशि का उपयोग या तो नहीं किया गया या फिर उसका सही लेखा-जोखा नहीं रखा गया। इसी कारण शासन स्तर पर वित्तीय अनुशासन को लेकर गंभीर आपत्ति जताई गई है।
ग्रांट रुकने का असर सीधे तौर पर शहर के विकास कार्यों पर पड़ सकता है। सड़क निर्माण, नालियों की सफाई व मरम्मत, सीवर और पेयजल व्यवस्था, स्ट्रीट लाइट, स्वच्छता अभियान और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कई प्रस्तावित कार्य प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। यदि जल्द ही यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट और खर्च का पूरा ब्यौरा शासन को नहीं सौंपा गया, तो आने वाले समय में विकास योजनाओं की रफ्तार और धीमी पड़ सकती है।
समीक्षा बैठक में यह भी संकेत दिए गए कि नगर निगम को जल्द से जल्द लंबित कागजी औपचारिकताओं को पूरा कर शासन को संतुष्ट करना होगा, ताकि रुकी हुई ग्रांट जारी हो सके। अन्यथा लखनऊ जैसे बड़े शहर में विकास कार्यों का पहिया थमने का खतरा बना रहेगा, जिसका खामियाजा सीधे आम नागरिकों को भुगतना पड़ सकता है।





