ग्राम सुरक्षा तंत्र ध्वस्त, पुलिसिंग जमीनी हकीकत से दूर

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बीट सिस्टम खत्म, चौकीदार व्यवस्था कमजोर—राजनीतिक संरक्षण में सिमटी पुलिस, अपराधियों के हौसले बुलंद

शरद कटियार
कभी गांव और कस्बों की सुरक्षा का आधार रही चौकीदार व्यवस्था, एसपीओ तंत्र, बीट कांस्टेबल और ग्राम सुरक्षा समितियां अब लगभग इतिहास बन चुकी हैं। पुराने थाना अध्यक्ष इन व्यवस्थाओं के सहारे हर गांव, हर मोहल्ले की पल-पल की गतिविधि पर नजर रखते थे। थाने और चौकियों में बीट रजिस्टर बाकायदा मेंटेन होता था और पुलिस की मौजूदगी खुद एक संदेश देती थी—“कानून सो रहा नहीं है।”
लेकिन आज हालात बिल्कुल उलट हैं। थानेदार और चौकी इंचार्ज इस जमीनी पुलिस व्यवस्था से इतने दूर हो गए हैं कि अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं। न बीट की धरातल पर मौजूदगी बची, न गश्त की गंभीरता। नतीजा यह कि गुंडागर्दी, दबंगई और मनमानियां आम बात बन चुकी हैं। जनता खुद को असुरक्षित महसूस कर रही है और अपराधियों का मनोबल बढ़ता जा रहा है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी अब जनता से ज्यादा अपने पद, प्रतिष्ठा और राजनीतिक छत्रछाया की सुरक्षा में लगे हैं। विशाल सरकारी बंगले, सुरक्षा कर्मियों का घेरा, कई-कई गाड़ियों का काफिला—ये सब रुतबा बचाने का प्रतीक बन चुके हैं। लेकिन जनता की सुरक्षा? वह प्राथमिकता की सूची में कहीं नहीं दिखती।
राजनीतिक दबाव और संरक्षण की इस परत ने निचले स्तर की पुलिसिंग को पूरी तरह कमजोर कर दिया है। थाने और चौकियां अब शिकायत केंद्र कम, दिखावटी कार्यालय ज्यादा बन गए हैं। गांवों में चौकीदारों की भूमिका खत्म हो चुकी है, बीट कांस्टेबल केवल कागज़ों में दर्ज हैं और ग्राम सुरक्षा समितियां नाममात्र की रह गई हैं।
लगातार सवाल उठा रहा है, क्या जनता की सुरक्षा से बड़ी कोई “कुर्सी” है? क्या रुतबे की चमक ने पुलिसिंग की जिम्मेदारियों को धुंधला कर दिया है? क्या पुरानी बीट प्रणाली को पुनर्जीवित किए बिना अपराध पर लगाम लगना संभव है?
जवाब जनता को नहीं, बल्कि उन अधिकारियों को देना होगा जो जनता के टैक्स पर पलते हैं, लेकिन जनता की सुरक्षा पर खामोश हैं।

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