एक युगपुरुष, जिसने अंधकार को चीरकर समाज को नई दिशा दी
जवाहर सिंह गंगवार
महात्मा ज्योतिबा फुले—एक ऐसा नाम, जो भारतीय समाज में समानता, न्याय और शिक्षा की मशाल लेकर खड़ा हुआ। उनकी पुण्यतिथि पर जब हम उन्हें याद करते हैं, तो यह सिर्फ एक महापुरुष को श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उनके द्वारा जगाई गई सामाजिक चेतना को पुनः जागृत करने का संकल्प भी है,1827 में पुणे के एक माली परिवार में जन्मे ज्योतिबा फुले जी की सामाजिक पृष्ठभूमि साधारण थी, लेकिन उनके विचार असाधारण। जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय को बचपन से देखने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी, बल्कि शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।
महात्मा फुले ने उस दौर में स्त्री शिक्षा का बीड़ा उठाया, जब लड़कियों को स्कूल भेजना अपराध माना जाता था।उन्होंने पुणे में 1848 में पहला लड़कियों का विद्यालय खोला।
और उल्लेखनीय बात यह कि उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं।
यह उस समय की सबसे क्रांतिकारी और साहसिक पहल थी—एक सामाजिक विद्रोह, जिसने भारतीय समाज की तस्वीर बदलनी शुरू की।
शोषितों, दलितों और वंचितों के सबसे बड़े नेता फुले जी ने समाज के उस तबके को आवाज दी, जिसे सदियों तक दबा दिया गया था।उन्होंने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की—एक ऐसा संगठन, जिसका उद्देश्य था,जाति पर आधारित भेदभाव खत्म करना,छुआछूत मिटाना,महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना,
और समाज में वैज्ञानिक सोच का प्रसार करना।
उन्होंने कहा था,“सत्य जानने और उसे समाज के सामने रखने का साहस ही असली क्रांति है।”कर्म, संघर्ष और त्याग के प्रतीक महात्मा फुले का जीवन केवल शब्दों का नहीं, बल्कि कर्म का जीवन था।
उन्होंने बाल विवाह के खिलाफ आवाज उठाई,विधवा विवाह को बढ़ावा दिया,किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया,और ब्राह्मणवादी पाखंडों को चुनौती देकर समाज में तार्किकता की नींव रखी।
उनका हर कदम एक क्रांति था, हर विचार एक नई सुबह।
21वीं सदी के भारत में, जहां आज भी शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष जारी है—
फुले जी का दर्शन मार्गदर्शन देता है।
वे हमें सिखाते हैं कि समाज तभी आगे बढ़ेगा, जब हर बच्चा शिक्षित होगा,हर महिला सुरक्षित और स्वतंत्र होगी,और हर व्यक्ति को बराबरी के अधिकार मिलेंगे।
उनका संदेश किसी एक जाति या वर्ग के लिए नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज के लिए है।
महात्मा ज्योतिबा फुले जी की पुण्यतिथि केवल स्मरण का दिन नहीं—यह वह दिन है जब हम उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का संकल्प लेते हैं।
उनके त्याग, तपस्या और सामाजिक न्याय के लिए किए गए संघर्ष को शत्–शत् नमन।
आज, यदि समाज में शिक्षा, समानता और मानवता का विचार जीवित है, तो उसमें फुले जी का योगदान अमूल्य है।
– लेखक साहित्यकार एवं वरिष्ठ अधिवक्ता हैँ।






