(अंजनी सक्सेना-विभूति फीचर्स)
15 अगस्त 1947 को जब लाल किले पर पहली बार तिरंगा फहराया गया था तो एक सपना था कि अब आंदोलनों का युग खत्म हुआ। अंग्रेज चले गए हैं, अब अपनी सरकार है, अब सड़क पर उतरने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पर आजादी के अठहत्तर साल बाद पीछे मुड़कर देखते हैं तो लगता है कि स्वतंत्र भारत का असली इतिहास संसद में नहीं, सड़कों पर लिखा गया है। हर पीढ़ी ने अपने हिस्से का आंदोलन किया और उसी से लोकतंत्र जिंदा रहा।
संविधान में राज्यों का नक्शा अंग्रेजों के हिसाब से बना था। मद्रास प्रेसीडेंसी में तेलुगु भाषी अलग राज्य मांग रहे थे। पोट्टी श्रीरामुलु ने 58 दिन तक अनशन किया और जान दे दी। उनकी मौत ने पूरे दक्षिण को जगा दिया। नेहरू को झुकना पड़ा। इस तरह 1953 में आंध्र प्रदेश पहला भाषाई राज्य बना और 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग ने देश का नया नक्शा बनाया।
1974 में इंदिरा गांधी सत्ता में थीं तब बिहार के छात्रों के गुस्से को जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति कहा। राममनोहर लोहिया ने पहले ही कहा था कि कांग्रेस में कुर्सी का खेल चल रहा है, जाति और अंग्रेजी का राज है। जेपी ने उसी बात को सड़क पर उतार दिया। उनका कहना था कि यह केवल सरकार बदलने की लड़ाई नहीं, आदमी और व्यवस्था दोनों को बदलने की लड़ाई है। इंदिरा गांधी ने इस चुनौती का जवाब आपातकाल से दिया। पच्चीस जून 1975 को आधी रात को आपातकाल लगा दिया गया। एक लाख लोग बंद हुए, प्रेस पर सेंसर लगा। पर दमन ने आंदोलन को खत्म नहीं किया, बड़ा कर दिया। 1977 में जब चुनाव हुए तो आजाद भारत में पहली बार कांग्रेस हारी। लालू यादव, नीतीश कुमार, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली जैसी पूरी पीढ़ी जेपी की पाठशाला से निकली।
अस्सी के दशक में उत्तराखंड के चमोली के रेणी गांव से उपजे चिपको आंदोलन ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। यहां ठेकेदारों को 2,400 से अधिक पेड़ काटने का ठेका मिला था। ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने पहुंचे तब गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाएं पेड़ों से चिपक गईं। सुंदरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट जैसे पर्यावरणविदों के नेतृत्व में यह आंदोलन फैला। बहुगुणा जी ने हजारों किलोमीटर की पदयात्राएं कीं। तब इंदिरा गांधी को हिमालयी क्षेत्रों में 15 साल के लिए व्यावसायिक पेड़ कटाई पर रोक लगानी पड़ी। भारत में पर्यावरण संरक्षण की चेतना, वन संरक्षण कानून और पर्यावरण मंत्रालय के गठन के पीछे चिपको आंदोलन की अहम भूमिका रही।
इस आंदोलन की चेतना ने आगे चलकर नर्मदा बचाओ आंदोलन को भी प्रेरित किया। मेधा पाटकर और बाबा आमटे इस आंदोलन के मुख्य अगुवा थे। उनका संघर्ष इस बात के लिए था कि बांध से बिजली तो मिलेगी पर जिनके घर डूबेंगे उनका क्या होगा? विस्थापन के सवाल पर दुनिया का सबसे लंबा अहिंसक आंदोलन चला। मेधा पाटकर अनेक बार अनशन पर बैठीं। आखिर सुप्रीम कोर्ट को निर्देश देने पड़े कि बिना उचित पुनर्वास के बांध का काम आगे नहीं बढ़ेगा। भारत में पुनर्वास नीति की नींव यहीं से मजबूत हुई।
नब्बे का दशक आते-आते आंदोलन की धारा खेत और जंगल से निकलकर मंडल और कमंडल तक आ गई। मंडल कमीशन ने ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण की बात कही। वीपी सिंह ने इसे लागू किया तो उत्तर भारत में व्यापक विरोध और प्रदर्शन हुए। सवर्ण छात्रों ने आत्मदाह तक किए। पर इस दौर ने भारतीय राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। जेपी आंदोलन और मंडल दौर से उभरे नेताओं ने सामाजिक न्याय और ओबीसी राजनीति को केंद्र में ला दिया। कांशीराम और मायावती भी उसी दौर की दलित और वंचित वर्गों की राजनीति से उभरे।
इसी समय राम जन्मभूमि आंदोलन ने दूसरा ध्रुव बनाया। लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और बाबरी विध्वंस ने देश की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। अब धर्म और सांस्कृतिक पहचान राजनीति के केंद्र में आ गए। इसकी परिणति 2019 में सुप्रीम कोर्ट के सर्वसम्मति से आए फैसले और 2024 में अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में हुई।
नई सदी में आंदोलन का चेहरा बदला। वह किसान और मजदूर से निकलकर मध्यवर्ग के ड्राइंग रूम तक आ गया। 2011 में 2जी, कॉमनवेल्थ और कोयला घोटालों से आहत मध्यवर्ग अन्ना हजारे के साथ जंतर-मंतर पर बैठ गया। जनलोकपाल की मांग ने रामलीला मैदान को भर दिया। उसी के साथ 16 दिसंबर 2012 को निर्भया कांड ने महिला सुरक्षा के सवाल को सड़क पर ला दिया। परिणामस्वरूप लोकपाल कानून बना, आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ और दुष्कर्म विरोधी कानूनों में भारी सख्ती आई।
सोशल मीडिया और मध्यवर्ग का यह गठजोड़ नया था। इसी नए दौर की अगली कड़ी ऐतिहासिक किसान आंदोलन था। केंद्र के तीन कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने व्यापक प्रदर्शन शुरू किया। 378 दिन तक सर्दी, गर्मी, बारिश और कोरोना के बीच यह आंदोलन दिल्ली की सीमाओं पर चलता रहा। अंततः 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री को तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी।
और अब इसी परंपरा में नए आंदोलन भी जुड़ रहे हैं, जो छात्र अधिकारों और चुनावी पारदर्शिता से जुड़े हैं।
नीट परीक्षा से जुड़े विवाद को समझना मुश्किल नहीं। लाखों छात्र और एक एकीकृत परीक्षा। 2024 में पेपर लीक के आरोप लगे, कई राज्यों में गिरफ्तारियां हुईं, ग्रेस मार्क्स को लेकर सवाल उठे और देश भर में कुल 67 छात्रों ने ऑल इंडिया रैंक-1 (AIR-1) हासिल की, जिससे व्यापक असंतोष फैला। छात्रों और कोचिंग संस्थानों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए। शुरुआत में जांच एजेंसियों की कार्रवाई और सीबीआई के हस्तक्षेप के बाद सच्चाई सामने आई। इसके परिणामस्वरूप नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के ढांचे में बड़े बदलाव किए गए, नेतृत्व बदला गया और परीक्षा प्रणाली में डिजिटल वाटरमार्किंग तथा बायोमेट्रिक जांच जैसी सुरक्षा परतें जोड़ने का निर्णय लिया गया।
दूसरा प्रमुख विषय मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ा है। चुनाव आयोग का तर्क है कि दशकों बाद मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण किया जा रहा है ताकि मृत, स्थानांतरित और डुप्लीकेट नामों को हटाकर सूची को त्रुटिरहित बनाया जा सके। वहीं दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि प्रक्रिया के नाम पर वैध मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। इसी मांग को लेकर विपक्षी गठबंधनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाई और दिल्ली में बाराखंबा रोड से सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकाला व संयुक्त याचिकाएं दाखिल कीं।
विपक्षी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से मांग रखी कि निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए प्रक्रिया पर पुनर्विचार हो और CEC का इस्तीफा लिया जाए। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस तथा अन्य वामपंथी एवं छात्र संगठनों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में मार्च निकाले और विरोध प्रदर्शन किए। इन प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा चिंताओं के चलते पुलिस द्वारा मामले दर्ज किए गए और यातायात नियंत्रण के उपाय किए गए। दूसरी ओर, सत्ताधारी दल और चुनाव आयोग ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और पुनरीक्षण प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी एवं नियमानुसार है।
पिछले अठहत्तर सालों के घटनाक्रम ने सिद्ध कर दिया है कि एक जीवंत लोकतंत्र कभी निष्क्रिय नहीं रह सकता। भाषाई पुनर्गठन, जेपी की संपूर्ण क्रांति, चिपको और नर्मदा के पर्यावरणीय संघर्षों से लेकर मंडल-कमंडल, अन्ना आंदोलन, किसान आंदोलन और हाल ही में परीक्षा सुधार तथा मतदाता सूची को लेकर उपजे आंदोलनों तक, हर दौर ने यह दिखाया है कि आंदोलन लोकतंत्र का सुरक्षा कवच हैं।
आंदोलन सफल भी होते हैं और असफल भी, उन्हें कभी व्यापक जनसमर्थन मिलता है, कभी नहीं भी मिलता, लेकिन ये आंदोलन इस बात के गवाह हैं कि विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। जब तक सड़कों पर जनता की आवाज बुलंद रहेगी, तब तक भारतीय लोकतंत्र न केवल जीवित रहेगा, बल्कि हर चुनौती के साथ और अधिक परिपक्व और मजबूत होकर उभरेगा। (विभूति फीचर्स)


