लोकतंत्र की मजबूती केवल निष्पक्ष मतदान से नहीं, बल्कि एक ऐसी मतदाता सूची से भी सुनिश्चित होती है, जिस पर हर नागरिक का भरोसा कायम रहे। उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान 16.18 लाख फॉर्म-6 एकत्र किए जाने को लेकर उठा विवाद इसी भरोसे और पारदर्शिता से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। वहीं, प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप बताया है।
इस विवाद को केवल राजनीतिक बयानबाजी मानकर खारिज करना उचित नहीं होगा। मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य पात्र नागरिकों को मतदान का अधिकार दिलाना और अपात्र नामों को सूची से हटाना है। इसलिए इस प्रक्रिया से संबंधित किसी भी सवाल का जवाब स्पष्ट तथ्यों, नियमों और सार्वजनिक अभिलेखों के आधार पर दिया जाना चाहिए।
विवाद का केंद्र यह है कि एसआईआर के दौरान 16.18 लाख फॉर्म-6 एकत्र किए जाने की बात सामने आई। ओवैसी का सवाल है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद नए मतदाताओं के नाम जोड़ने से संबंधित आवेदन किस नियम के तहत और किस चरण में स्वीकार किए गए। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि एसआईआर का इस्तेमाल मतदाता सूची को इस तरह प्रभावित करने के लिए नहीं होना चाहिए, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर संदेह पैदा हो।
दूसरी ओर, मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा के स्पष्टीकरण के मुताबिक, 27 अक्टूबर 2025 से 6 जनवरी 2026 के बीच गणना चरण में बूथ स्तरीय अधिकारियों ने घर-घर जाकर 16.18 लाख फॉर्म-6 एकत्र किए थे। ये ऐसे पात्र नागरिकों के आवेदन बताए गए, जिनके नाम उस समय की मतदाता सूची में शामिल नहीं थे। अधिकारी का कहना है कि आवेदन एकत्र करने की प्रक्रिया निर्वाचन आयोग के निर्देशों के अनुरूप थी और निर्धारित दावा-आपत्ति अवधि में प्राप्त आवेदनों का विवरण फॉर्म-9 के माध्यम से सार्वजनिक किया गया।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। आवेदन एकत्र किया जाना, उसका परीक्षण होना, आवेदन स्वीकृत होना और मतदाता सूची में नाम शामिल होना—ये सभी अलग-अलग चरण हैं। इसलिए 16.18 लाख फॉर्म एकत्र किए जाने के आंकड़े को स्वतः इतने मतदाताओं के नाम सूची में जुड़ जाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। विवाद की वास्तविक स्थिति समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि कितने आवेदन प्राप्त हुए, कितने लंबित रहे, कितने स्वीकार किए गए और कितने अस्वीकार हुए।
यदि निर्वाचन आयोग के पास पूरी प्रक्रिया के समर्थन में स्पष्ट अभिलेख और नियम हैं, तो उन्हें सार्वजनिक करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। आवेदन प्राप्त होने की तारीख, उनके सत्यापन की स्थिति, स्वीकृति और अस्वीकृति के आंकड़े तथा संबंधित निर्देशों की जानकारी सामने आने से अनावश्यक भ्रम दूर हो सकता है। इसी तरह, यदि किसी राजनीतिक दल या नेता के आरोप तथ्यों से मेल नहीं खाते, तो आयोग का आधिकारिक स्पष्टीकरण और दस्तावेज उन आरोपों का उत्तर देने के लिए पर्याप्त आधार बन सकते हैं।
लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता अत्यंत महत्वपूर्ण है। उसकी जिम्मेदारी केवल चुनाव संपन्न कराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदाता सूची में स्थान मिले और किसी अपात्र व्यक्ति का नाम नियमों के विरुद्ध शामिल न हो। मतदाता सूची में त्रुटि का संदेह भी नागरिकों के विश्वास को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ऐसी परिस्थितियों में संवाद, दस्तावेजों की उपलब्धता और जवाबदेही का महत्व और बढ़ जाता है।
एसआईआर जैसे व्यापक अभियान में बड़ी संख्या में आवेदन मिलना अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है। लेकिन बड़ी संख्या के आधार पर उठे सवालों को बिना पर्याप्त जानकारी दिए समाप्त मान लेना भी उचित नहीं होगा। आरोपों की पुष्टि के लिए प्रमाण चाहिए और उन्हें खारिज करने के लिए भी ठोस तथ्य आवश्यक हैं।
उत्तर प्रदेश में फॉर्म-6 को लेकर उठा विवाद इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए। न तो बिना जांच के निर्वाचन प्रक्रिया पर संदेह को अंतिम निष्कर्ष मानना उचित है और न ही पारदर्शिता से जुड़े प्रश्नों को महज राजनीतिक आरोप बताकर नजरअंदाज करना। निर्वाचन आयोग को संबंधित नियमों और आंकड़ों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि जनता के सामने तथ्य और आरोप के बीच का अंतर साफ हो सके।


