
– मृत पूर्वजों के लिए श्रद्धा और जीवित बुजुर्गों के लिए अकेलापन
शरद कटियार
भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि संस्कारों और परंपराओं की धरती है। यहां माता-पिता को देवतुल्य माना गया है। हमारे धार्मिक और सामाजिक जीवन में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की अनेक परंपराएं हैं। उनमें श्राद्ध की परंपरा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हम अपने दिवंगत पूर्वजों को याद करते हैं, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं और उनके नाम पर दान-पुण्य करते हैं।
लेकिन इसी समाज के सामने आज एक गंभीर प्रश्न है
जिस देश में मृत पूर्वजों के लिए श्राद्ध जैसी अनूठी परंपरा हो, वहां जीवित बुजुर्गों का अकेलेपन और उपेक्षा का जीवन जीना हमारे सामाजिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय क्यों न हो?
वृद्धाश्रम अपने आप में कोई बुरी संस्था नहीं है। कई वृद्धाश्रम ऐसे बुजुर्गों को आश्रय, भोजन, चिकित्सा और साथ देते हैं जिनके पास वास्तव में कोई सहारा नहीं है। कुछ बुजुर्ग अपनी इच्छा से भी वहां रहना चुनते हैं। इसलिए प्रत्येक वृद्धाश्रम को केवल उपेक्षा का प्रतीक मानना उचित नहीं होगा।
लेकिन चिंता तब बढ़ती है, जब कोई बुजुर्ग अपने ही परिवार के बीच रहते हुए भी भावनात्मक रूप से अकेला हो जाता है।
बुजुर्गों ने अपनी पूरी जिंदगी परिवार के निर्माण में लगा दी। उन्होंने बच्चों को पढ़ाया, उनके भविष्य के लिए संघर्ष किया, अपनी इच्छाओं को पीछे रखा और परिवार को आगे बढ़ाने के लिए अपनी सुविधाओं का त्याग किया। जब वही माता-पिता उम्र के उस पड़ाव पर पहुंचते हैं, जहां उन्हें सबसे ज्यादा अपनापन, सम्मान और साथ चाहिए, तब यदि उन्हें अपने ही घर में उपेक्षा महसूस होने लगे तो यह केवल एक पारिवारिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का प्रश्न है।
आज परिवार छोटे हो रहे हैं। संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवार बढ़ रहे हैं। नौकरी, व्यवसाय और दूसरी व्यस्तताओं ने जीवन की गति तेज कर दी है। इन परिस्थितियों में बुजुर्गों की जरूरतें भी बदल रही हैं। उन्हें केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि समय, बातचीत, सम्मान और अपनापन चाहिए।
कई बार बुजुर्गों को सबसे ज्यादा दुख किसी सुविधा की कमी से नहीं, बल्कि इस बात से होता है कि कोई उनके पास बैठकर दो शब्द बोलने वाला नहीं है।
याद रखिए,बुजुर्गों को हमेशा बड़ी चीजों की जरूरत नहीं होती।
कभी उनके साथ बैठकर चाय पी लेना ही उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान होता है।उनकी बात ध्यान से सुन लेना भी एक तरह की सेवा है।हम अपने बच्चों को संस्कारों की बातें बताते हैं। उन्हें श्रवण कुमार की कथा सुनाते हैं। माता-पिता के सम्मान की सीख देते हैं। लेकिन संस्कार केवल कहानियों और धार्मिक अनुष्ठानों में नहीं होते। संस्कार तब दिखाई देते हैं जब घर का बुजुर्ग कमजोर होकर आपकी ओर देखता है और आप उसके पास बैठने के लिए अपने व्यस्त जीवन से कुछ समय निकालते हैं।
मृत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा रखना हमारी संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन जीवित माता-पिता और बुजुर्गों के प्रति सम्मान, देखभाल और संवेदना उस संस्कृति की जीती-जागती अभिव्यक्ति है।
इसलिए सवाल वृद्धाश्रम के अस्तित्व का नहीं, बल्कि उस परिस्थिति का है जिसमें किसी बुजुर्ग को यह महसूस हो कि अपने ही घर में उसके लिए जगह नहीं बची।आइए, श्राद्ध में पूर्वजों को याद करने के साथ-साथ अपने घर के जीवित बुजुर्गों की भी सुध लें।उनसे बात करें।
उनकी सुनें।उनकी जरूरत पूछें उनके साथ बैठें।और सबसे बढ़कर,उन्हें यह एहसास कराएं कि वे परिवार पर बोझ नहीं, परिवार की जड़ हैं।
क्योंकि जिस पीढ़ी ने हमें चलना सिखाया, उसके जीवन के अंतिम पड़ाव में हमारा हाथ उसके हाथ में होना चाहिए।
पूर्वजों के प्रति श्रद्धा हमारी परंपरा है,लेकिन जीवित बुजुर्गों के प्रति सम्मान हमारी जिम्मेदारी है।और शायद यही किसी भी सभ्य समाज की असली पहचान है।


