डॉ. सत्यवान सौरभ
भारत में सामाजिक न्याय की बहस जितनी पुरानी है, उतनी ही संवेदनशील भी। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के साथ भेदभाव, सामाजिक अपमान और हिंसा लंबे समय से गंभीर सामाजिक चुनौती रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 अस्तित्व में आया। तीन दशक से अधिक समय बाद आज इसके उद्देश्य, प्रभावशीलता और इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर बहस जारी है।
1989 में कानून बनाए जाने के पीछे सरकार का तर्क था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग सामाजिक अपमान, हिंसा, जमीन से बेदखली, जबरन मजदूरी और अन्य प्रकार के अत्याचारों के प्रति संवेदनशील थे। उस समय सरकार का मानना था कि नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 और सामान्य दंड कानून इन अपराधों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं थे। इसी कारण विशेष कानून की आवश्यकता महसूस की गई।
इस अधिनियम का उद्देश्य केवल अपराध दर्ज करना नहीं था, बल्कि अत्याचारों की रोकथाम, पीड़ितों को राहत एवं पुनर्वास और मामलों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायिक व्यवस्था उपलब्ध कराना भी था।
किसी कानून की आवश्यकता और उसके संभावित दुरुपयोग की आशंका—दो अलग-अलग प्रश्न हैं। कठोर कानून का उद्देश्य वास्तविक पीड़ितों को तत्काल सुरक्षा देना होना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी निर्दोष व्यक्ति को केवल आरोप लग जाने के कारण अन्याय का सामना न करना पड़े।
समय-समय पर न्यायपालिका के समक्ष इस कानून की कुछ धाराओं और गिरफ्तारी की प्रक्रिया से जुड़े प्रश्न भी आए हैं। बाद में संसद ने कानून में संशोधन भी किए। इससे स्पष्ट है कि कानून की प्रभावशीलता के साथ-साथ उसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया पर भी निरंतर विमर्श आवश्यक है।
इस कानून को लेकर एक धारणा यह भी है कि झूठी शिकायत करने वाले व्यक्ति को सरकार की ओर से पैसा, मकान या नौकरी दी जाती है। यह प्रस्तुति तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। कानून और उससे संबंधित नियमों में अत्याचार के पीड़ितों को राहत और पुनर्वास का प्रावधान है। इसे झूठी शिकायत के लिए पुरस्कार के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
हालांकि, यदि किसी कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत दुश्मनी, संपत्ति विवाद, स्थानीय संघर्ष या किसी अन्य दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य के लिए किया जाता है, तो ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच आवश्यक है। किसी भी कानून का जानबूझकर दुरुपयोग उसकी विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है।
एससी-एसटी एक्ट को लेकर राजनीतिक बहस भी होती रही है। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि यह कानून 1989 में तत्कालीन केंद्र सरकार के कार्यकाल में संसद द्वारा पारित किया गया था। लेकिन किसी राजनीतिक दल की मंशा को लेकर निष्कर्ष निकालने के लिए उसके आधिकारिक दस्तावेजों, निर्णयों और प्रमाणित ऐतिहासिक साक्ष्यों का अध्ययन जरूरी है।
राजनीतिक आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन आलोचना और प्रमाणित तथ्य के बीच अंतर बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
भारत की सामाजिक संरचना विविध और जटिल है। जातिगत भेदभाव का इतिहास वास्तविक है और उसे नकारने से सामाजिक समस्या का समाधान नहीं हो सकता। दूसरी ओर, कानून के नाम पर निर्दोष व्यक्ति में भय की स्थिति भी न्यायपूर्ण समाज की पहचान नहीं हो सकती।
सामाजिक न्याय का अर्थ किसी एक सामाजिक समूह को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना नहीं है। न्याय व्यवस्था का मूल उद्देश्य होना चाहिए कि दोषी को दंड मिले और निर्दोष व्यक्ति को संरक्षण मिले।
आज आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें जाति आधारित अत्याचार के वास्तविक मामलों में तेजी और कठोरता से कार्रवाई हो, पीड़ितों को समय पर राहत मिले, जांच निष्पक्ष हो और आरोपित व्यक्ति को संविधान एवं कानून के तहत उपलब्ध न्यायिक अधिकार प्राप्त हों।
यदि कोई शिकायत जानबूझकर झूठी और दुर्भावनापूर्ण साबित होती है, तो कानून के अनुसार उसके विरुद्ध भी कार्रवाई की जानी चाहिए। इससे वास्तविक पीड़ितों के अधिकार कमजोर नहीं होते, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था में लोगों का विश्वास मजबूत होता है।
सामाजिक न्याय और सामाजिक सद्भाव एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। भारत को ऐसी न्याय व्यवस्था की आवश्यकता है जो कमजोर की रक्षा करे, दोषी को दंडित करे और निर्दोष को भय से मुक्त रखे। किसी कानून की सफलता केवल उसकी कठोरता से नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्षता, प्रभावशीलता और न्यायपूर्ण क्रियान्वयन से तय होती है।
लोकतंत्र में कानून का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि न्याय, समानता और नागरिकों के विश्वास को मजबूत करना होना चाहिए।“कानून की वास्तविक शक्ति उसकी कठोरता में नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्षता में है।”


