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Saturday, September 26, 2026

एनडीए के सहयोगियों ने ही मांगा चुनाव आयोग से जवाब

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चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और टीडीपी ने कहा जनता के मन का भ्रम दूर करे आयोग

भरोसा कमजोर हुआ तो लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं

नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चल रहे विवाद ने अब सत्तारूढ़ एनडीए के भीतर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष के लगातार हमलों के बीच एनडीए के तीन सहयोगी दलों—लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), राष्ट्रीय लोक मोर्चा और तेलुगु देशम पार्टी—ने चुनाव आयोग से पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। सहयोगी दलों के इस रुख ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर चल रही बहस को और गंभीर बना दिया है।

केंद्रीय मंत्री और लोजपा (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान ने साफ कहा कि सरकार का हिस्सा होने के बावजूद उनका उद्देश्य किसी संवैधानिक संस्था का बचाव करना नहीं है। उनका कहना है कि यदि चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर जनता के मन में सवाल उठ रहे हैं तो आयोग, खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, को मजबूती से अपना पक्ष सामने रखना चाहिए। चिराग ने कहा कि चुनावी व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर होना लोकतंत्र के लिए ठीक संकेत नहीं है।

इसी कड़ी में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने भी चुनाव आयोग से तत्काल स्पष्टीकरण की मांग की। उन्होंने कहा कि एसआईआर को लेकर जारी विवाद से आम लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हुई है और आयोग को वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यानी सवाल अब केवल विपक्ष की ओर से नहीं उठ रहे, बल्कि एनडीए के भीतर से भी चुनाव आयोग से जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग सामने आई है।

तेलुगु देशम पार्टी के लोकसभा फ्लोर लीडर लावु श्रीकृष्ण देवरायालु ने भी चुनाव आयोग को पारदर्शिता बरतने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश में एसआईआर की प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से पूरी हुई और मतदाताओं को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिला। इसके बावजूद उनका कहना है कि जब किसी संवैधानिक संस्था को लेकर सवाल उठें तो उचित स्पष्टीकरण देना जनता का विश्वास मजबूत करने में मदद करता है।

दरअसल, एसआईआर को लेकर विवाद उस रिपोर्ट के बाद तेज हुआ जिसमें चुनाव आयोग के दो आयुक्तों की ओर से पिछले कुछ महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा किया गया। रिपोर्ट में मतदाता पंजीकरण फॉर्म-6, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया और मतदाता सूची के डाटाबेस से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया। हालांकि चुनाव आयोग ने कहा है कि सदस्यों के बीच अलग-अलग राय होना संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा है और आयोग के अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सत्ता पक्ष के सहयोगी दल भी चुनाव आयोग से जनता के भ्रम और आशंकाओं को दूर करने के लिए स्पष्ट जवाब मांग रहे हैं, तो आयोग इस पूरे विवाद पर कितना विस्तृत और स्पष्ट पक्ष सामने रखता है। एसआईआर को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाताओं का भरोसा इस बहस के केंद्र में आ गया है।

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