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Friday, September 25, 2026

पुस्तक चर्चा: काश! मैं बादल होता

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(विवेक रंजन श्रीवास्तव-विभूति फीचर्स)

कविता के लिए हमेशा किसी असाधारण घटना की जरूरत नहीं होती। एक खाली मेज़, उड़ती पतंग, पहली बारिश की खुशबू, किसी मित्र की स्मृति या मन में उठती कोई छोटी-सी शिकायत भी कविता का कारण बन सकती है। आशुतोष झुड़ेले ‘ओ रे कबीरा’ का संग्रह ‘काश! मैं बादल होता’ इसी सहज अनुभूति से निकली 51 कविताओं का संसार है। कवि स्वयं स्वीकार करता है कि ये कविताएँ जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुख, त्योहारों, घटनाओं और रोजमर्रा के अनुभवों से बनी हैं।
इस संग्रह को पढ़ते हुए लगता है कि कवि कविता लिखने से अधिक जीवन को पकड़ने की कोशिश करता है। ‘बग़ीचे की मेज़’ इसका सुंदर उदाहरण है। सामान्य-सी दिखाई देने वाली एक मेज़ कवि की दृष्टि में अनेक जीवन-कथाओं की साक्षी बन जाती है। वहाँ बुजुर्ग हैं, बच्चे हैं, प्रेमी युगल हैं, अकेलेपन की तलाश में आए लोग हैं और अपने हिस्से के लिए संघर्ष करते चेहरे भी। अंततः वही मेज़ खाली होती है और कवि को लगता है,“यहीं तो मेरी मुलाक़ात आज उम्मीद से होने वाली है।” वस्तु को जीवन के रूपक में बदल देना इस कविता की उपलब्धि है।
संग्रह में स्मृति एक महत्वपूर्ण संवेदनात्मक आधार है। ‘चुरा ले गए’ में कवि उन चीजों की तलाश करता है जो आधुनिक जीवन में धीरे-धीरे हमसे छूटती जा रही हैं, सुबह की ताजगी, शाम की सादगी, पहली बारिश की खुशबू, बगीचे के फूल और आँगन की मिट्टी। “कुछ लोग पहली बारिश की ख़ुशबू चुरा ले गए” केवल एक सुंदर बिंब नहीं, संवेदनाओं के क्षरण की ओर बड़ा संकेत है।
इसी क्रम में ‘पतझड़ के भी रंग होते हैं’ जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी सौंदर्य खोजती है। पतझड़ यहाँ अंत नहीं, देखने की नई दृष्टि है। सूखे पत्तों, गिरे फूलों और पुराने गीतों में भी रंग और स्मृति बची हुई है। यह कविता संग्रह के आशावादी स्वर को पहचान देती है।
‘पतंग सी जिंदगी’ में जीवन की उड़ान और उसकी डोर का सुंदर साम्य है। पतंग दूर जाती है, लौटती है, हवा से संघर्ष करती है, फिर भी डोर से जुड़ी रहती है। स्वतंत्रता और संबंधों के बीच मनुष्य की स्थिति को कवि ने एक परिचित लोक-प्रतीक में सहजता से बाँधा है।
आशुतोष की कविता केवल निजी अनुभवों तक सीमित नहीं रहती। ‘भीड़ की आड़ में’ सामाजिक विडंबनाओं पर तीखा प्रश्न करती है। धर्म, जाति और सामूहिक पहचान के पीछे छिपकर मनुष्य अपने दोषों से बचने की कोशिश करता है। कविता का निष्कर्ष आत्ममंथन की ओर ले जाता है,दोष किसी भीड़ का नहीं, अंततः मनुष्य का अपना है। ‘हम सोचते हैं’ इसी तेवर को व्यंग्य में बदलती है और हमारी सामाजिक स्मृति तथा आत्ममुग्धता पर चोट करती है।
‘दर दर गंगे’ में सांस्कृतिक आस्था और पर्यावरणीय चिंता साथ दिखाई देती हैं। गंगोत्री से गंगासागर तक की यात्रा में कवि उस नदी की पीड़ा दर्ज करता है जिसे हम माँ कहते हैं, जिसकी आरती करते हैं, पर जिसकी रक्षा का दायित्व भूल जाते हैं। “बहाती जा रही बस आँसू” जैसे बिंब श्रद्धा को जिम्मेदारी से जोड़ देते हैं। इस तरह के कई नवाचारी रूपक कवि की अनुभव जन्य भाषा ,भाव , शब्द सामर्थ्य के परिचायक हैं। यद्यपि यह कवि की पहली ही कृति है, उनके व्यक्तित्व की तरह व्यापक सुगठित सरल तथा परिपक्व है।
‘भोपाल’ संग्रह की अत्यंत छोटी, किंतु गहरी कविता है। “हवा क्या होती है, पूछो भोपाल से…” जैसे लगातार प्रश्न एक त्रासदी को केवल घटना न रहने देकर सामूहिक स्मृति में बदल देते हैं। शब्द कम हैं, लेकिन उनके पीछे भय, अन्याय और जीवन-मृत्यु का पूरा अनुभव उपस्थित है। भोपाल गैस त्रासदी पर केंद्रित यह कविता महत्वपूर्ण संवेदी, दस्तावेजी रचना बन पड़ी है।
रिश्तों की नाजुकता भी कवि की प्रमुख चिंता है। ‘डोर’ में समय और संबंध दोनों को ऐसे धागे की तरह देखा गया है जो लंबा होने पर अपना सिरा खो देता है और तनिक से झटके में टूट भी सकता है। ‘रिश्ते’ कविता अपेक्षा और उपेक्षा के बजाय देने और कर्म को महत्व देती है। ‘शिकायत थी मुझको’ में शिकायतों की पूरी सूची अंततः आत्मबोध सामने लाती है। कबीरा का मुस्कुराकर ‘मूरख’ कहना कविता को उपदेश नहीं, आत्मव्यंग्य बना देता है। खुद पर व्यंग्य कर पाना एक सामर्थ्यवान कवि की पहचान है।
‘पहचानो तुम कौन हो?’ संग्रह की उल्लेखनीय रचनाओं में है। भेड़ों के बीच पला शेर का बच्चा स्वयं को भेड़ समझता रहता है। अपनी वास्तविक पहचान से अपरिचित यह शेर हमारे भीतर छिपी संभावनाओं का रूपक बन जाता है। कविता का प्रश्न इसलिए केवल शेर से नहीं, पाठक से भी है, हम अपने बारे में जो मानते हैं, क्या वास्तव में वही हैं?
संग्रह की भाषा उसकी अपनी पहचान है। हिंदी के साथ उर्दू और लोकभाषा के शब्द सहजता से आते हैं। पुनरावृत्ति, संवाद और लोकलय कई कविताओं को मंचीय प्रभाव देते हैं। ‘तू है गज’ में लगातार दोहराया गया संबोधन हाथी को भारतीय सांस्कृतिक स्मृति, शक्ति, करुणा और अस्तित्व के व्यापक प्रतीक में बदल देता है।
‘काश! मैं बादल होता’ की कविताएँ बड़े दार्शनिक निष्कर्षों का दावा नहीं करतीं। वे छोटे अनुभवों से छोटी-छोटी रोशनियाँ चुनती हैं। यही इनकी विशेषता है। कहीं स्मृति है, कहीं व्यंग्य, कहीं सामाजिक सरोकार, कहीं पर्यावरण की चिंता और कहीं आत्मसंवाद। कवि बादल बनकर उड़ना चाहता है, पतंग बनकर लौटता है, खाली मेज़ पर उम्मीद खोजता है और अंततः स्वयं से ही पूछता है, “पहचानो तुम कौन हो?”कविताएं पढ़कर समझ आता है कि आशुतोष जी साहित्य के एक अच्छे पाठक हैं, तथा कला संस्कृति उनकी अभिरुचि है, जो रचनाओं में मुखर हुई दिखती है।
कविता यहाँ जीवन से अलग कोई सजाया हुआ संसार नहीं, बल्कि जीवन को थोड़ी देर ठहरकर देखने की कला है। ‘काश! मैं बादल होता’ इसी ठहरने, देखने और फिर भीतर कुछ बदल लेने का सहज आमंत्रण है। कवि की आगामी रचना यात्रा के पड़ाव की प्रतीक्षा रहेगी । (विभूति फीचर्स)

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