शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में विकास अब केवल घोषणाओं का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारों के लिए अपनी विश्वसनीयता साबित करने की सबसे बड़ी कसौटी बन चुका है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लिए गए फैसलों को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। एक्सप्रेसवे, औद्योगिक नीति, एथेनॉल उत्पादन, स्मार्ट स्कूल, शहरी विस्तार, परिवहन, न्यायिक ढांचे और सरकारी तंत्र के वित्तीय अधिकारों से जुड़े निर्णय बताते हैं कि सरकार विकास को अलग-अलग क्षेत्रों में एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
चित्रकूट लिंक एक्सप्रेसवे को मंजूरी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बुंदेलखंड लंबे समय तक खराब कनेक्टिविटी और सीमित औद्योगिक अवसरों के कारण विकास की मुख्यधारा से अपेक्षाकृत पीछे रहा है। 15.172 किलोमीटर लंबे छह लेन के प्रवेश नियंत्रित ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे पर 1,008.67 करोड़ रुपये का निवेश केवल सड़क निर्माण का मामला नहीं है। बेहतर संपर्क का वास्तविक लाभ तभी सामने आएगा, जब इसके साथ पर्यटन, छोटे उद्योग, स्थानीय कारोबार और रोजगार की योजनाएं भी समान गति से आगे बढ़ें। चित्रकूट धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है; इसलिए कनेक्टिविटी में सुधार को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना जरूरी होगा।
खिलौना विनिर्माण प्रोत्साहन नीति-2025 भी बदलती अर्थव्यवस्था की जरूरतों को समझने का प्रयास दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश में पारंपरिक कारीगरी और हस्तनिर्मित खिलौनों की समृद्ध परंपरा है। चुनौती यह है कि इन कारीगरों को केवल सरकारी प्रोत्साहन का लाभार्थी न बनाकर आधुनिक बाजार, डिजाइन, तकनीक, पैकेजिंग और ई-कॉमर्स से जोड़ा जाए। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड और मध्यांचल में उद्योग को प्रोत्साहन देने का फैसला क्षेत्रीय असंतुलन कम करने की दिशा में उपयोगी हो सकता है।
छाता चीनी मिल में एथेनॉल प्लांट का प्रस्ताव भी कृषि और उद्योग को जोड़ने वाली नीति का उदाहरण है। गन्ने के बाद मक्का और धान से एथेनॉल उत्पादन का विचार किसानों की उपज के लिए अतिरिक्त बाजार पैदा कर सकता है। लेकिन ऐसे संयंत्रों की सफलता केवल उत्पादन क्षमता से नहीं मापी जानी चाहिए। कच्चे माल की नियमित उपलब्धता, किसानों को समय पर भुगतान, पर्यावरणीय मानकों और स्थानीय रोजगार को भी सफलता के पैमाने में शामिल करना होगा।
पीआरडी स्वयंसेवकों के दैनिक ड्यूटी भत्ते को 500 से बढ़ाकर 600 रुपये करना और कैशलेस चिकित्सा सुविधा देना सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण निर्णय है। लंबे समय से सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्थाओं में सहयोग करने वाले स्वयंसेवकों को आर्थिक तथा स्वास्थ्य सुरक्षा मिलना आवश्यक है। हालांकि, ऐसी योजनाओं का वास्तविक मूल्य तभी है जब भुगतान समय पर हो और चिकित्सा सुविधा कागजों के बजाय अस्पतालों में सहज रूप से उपलब्ध हो।
अभियंताओं के वित्तीय अधिकार बढ़ाने का निर्णय प्रशासनिक सुधार की दिशा में उठाया गया कदम है। तीन दशक से अधिक पुराने प्रावधानों में बदलाव इसलिए जरूरी था क्योंकि निर्माण लागत और परियोजनाओं का स्वरूप काफी बदल चुका है। निर्णय लेने की प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत करने से विकास कार्यों में तेजी आ सकती है, लेकिन इसके साथ पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत करनी होगी। अधिकार बढ़ें तो निगरानी भी बढ़नी चाहिए।
लखनऊ की हाईटेक टाउनशिप परियोजना को एलडीए के माध्यम से पूरा कराने का फैसला हजारों होमबायर्स के लिए उम्मीद पैदा करता है। करीब 5,000 खरीदारों की समस्या केवल रियल एस्टेट का मामला नहीं, बल्कि आम नागरिक के भरोसे का प्रश्न है। सरकारी एजेंसी के माध्यम से रुकी परियोजना को पूरा कराने की कोशिश स्वागत योग्य है, लेकिन भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए रियल एस्टेट परियोजनाओं की निगरानी व्यवस्था को और प्रभावी बनाना होगा।
शिक्षा के क्षेत्र में 14,429 प्राथमिक विद्यालयों को स्मार्ट स्कूल के रूप में विकसित करने का निर्णय सबसे दूरगामी प्रभाव वाला हो सकता है। 300 करोड़ रुपये की स्वीकृति और डिजिटल संसाधनों का विस्तार तभी सार्थक होगा जब स्मार्ट क्लास केवल उपकरणों तक सीमित न रह जाए। असली चुनौती शिक्षकों को डिजिटल शिक्षण के लिए प्रशिक्षित करना, इंटरनेट और बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा बच्चों को गुणवत्तापूर्ण डिजिटल सामग्री उपलब्ध कराना है। स्कूल में स्मार्ट बोर्ड लगाना आसान है, लेकिन उसे प्रभावी शिक्षण का माध्यम बनाना कठिन काम है।
इसी तरह स्वचालित परीक्षण स्टेशनों की नई नीति सड़क सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। मशीन आधारित फिटनेस जांच से मानवीय हस्तक्षेप कम होने और पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है। मगर तकनीक तभी भरोसेमंद बनेगी जब मशीनों का नियमित कैलिब्रेशन, स्वतंत्र निगरानी और शिकायत निवारण की व्यवस्था मजबूत हो।
नए शहरों के विकास के लिए लखनऊ, उन्नाव और रायबरेली की परियोजनाओं को 380 करोड़ रुपये की पहली किस्त तथा वित्तीय वर्ष 2026-27 में 3,500 करोड़ रुपये के बजटीय प्रावधान से सरकार की शहरी विस्तार संबंधी प्राथमिकता स्पष्ट होती है। लेकिन नए शहर केवल जमीन और सड़क से नहीं बनते। पानी, सीवर, बिजली, सार्वजनिक परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और हरित क्षेत्र जैसी सुविधाएं शुरुआत से योजना का हिस्सा बननी चाहिए। वरना नए शहर पुराने शहरों का विस्तार भर बनकर रह जाएंगे।
इन सभी फैसलों को एक साथ देखने पर सरकार की नीति में तीन प्रमुख लक्ष्य दिखाई देते हैं,कनेक्टिविटी बढ़ाना, रोजगार एवं निवेश को बढ़ावा देना और सार्वजनिक सेवाओं को आधुनिक बनाना। यह दिशा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। मगर लोकतंत्र में किसी भी सरकार के फैसलों का अंतिम मूल्यांकन घोषणाओं की संख्या से नहीं, बल्कि उनके परिणाम से होता है।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में करोड़ों लोगों की अपेक्षाएं हैं। इसलिए अब चुनौती कैबिनेट से फैसले निकलने के बाद शुरू होती है। परियोजनाएं समय पर पूरी हों, बजट का प्रभावी उपयोग हो, भ्रष्टाचार पर अंकुश रहे, लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचे और सरकारी मशीनरी जवाबदेह बने,यही इन फैसलों की असली परीक्षा होगी।
सरकार ने विकास की दिशा में कई मोर्चे खोल दिए हैं। अब जनता यह देखना चाहेगी कि इन फैसलों की रफ्तार फाइलों में कितनी है और जमीन पर कितनी। उत्तर प्रदेश को निवेश और बुनियादी ढांचे के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और बेहतर सार्वजनिक सेवाओं की जरूरत है।
यदि कैबिनेट के ये निर्णय समयबद्ध तरीके से धरातल पर उतरते हैं, तो वे प्रदेश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे में वास्तविक बदलाव का आधार बन सकते हैं। फैसले महत्वपूर्ण हैं, लेकिन परिणाम उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं। यही सुशासन की अंतिम कसौटी है।


