(सुभाष आनंद-विभूति फीचर्स)
देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमने वाले तो कई थे, पर एक ऐसा क्रांतिकारी भी था जिसने जेल की काल कोठरी में 63 दिन तक भूखा रहकर अंग्रेजी हुकूमत को घुटनों पर ला दिया था। हम बात कर रहे हैं महान बलिदानी यतिन्द्रनाथ दास की, जिन्होंने 13 सितंबर 1929 को लाहौर की बोर्स्टल जेल में अपना बलिदान दिया था।
उनकी शहादत सिर्फ एक मौत नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के अमानवीय चेहरे को उजागर करने वाला ऐतिहासिक दस्तावेज थी। उनकी मौत पर केन्द्रीय असेम्बली में काम रोको प्रस्ताव तक पेश हुआ था, पंडित मोतीलाल नेहरू ने इसे हत्या करार दिया था और मोहम्मद अली जिन्ना तक को कहना पड़ा था कि ये साधारण अपराधी नहीं, आत्मा की आवाज पर लड़ने वाले सच्चे देशभक्त हैं।
फिरोजपुर के प्रसिद्ध पत्रकार स्व. सत्यपाल बागी के पिता स्वतंत्रता सेनानी स्व. बिहारी लाल दीवाना ने अपने संस्मरणों में उस अमर बलिदान की गाथा को बहुत ही मार्मिक ढंग से व्यक्त किया था। 14 सितंबर 1929 को पंडित मोतीलाल नेहरू ने अंग्रेज सरकार को ललकारते हुए कहा था – “मेरा आरोप है कि सरकार ने मानवीय तत्वों का नितांत अभाव प्रदर्शित किया है। जिस समय मनुष्य की ज्योति धीरे-धीरे बुझ रही थी, उस समय सरकार चुपचाप तमाशा देखती रही। यह हत्या का केस है।”
यतिन्द्रनाथ दास का जन्म 27 अक्टूबर 1904 को कोलकाता में बंकिम दास के घर हुआ था। वे गंभीर, शांत और मृदुभाषी थे। कम बोलते थे, पर व्यवहार में ऐसा आकर्षण था कि थोड़े ही समय में सभी क्रांतिकारियों के प्रिय बन गए। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
12 जुलाई 1929 को जब शहीद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त अदालत में मिले, तो भूख हड़ताल को एक महीने से ऊपर हो गया था। प्रस्ताव रखा गया कि सारे क्रांतिकारी एक साथ भूख हड़ताल करें। 13 जुलाई से अनशन बड़े स्तर पर शुरू हुआ। जेल अधिकारी अच्छे-अच्छे पकवान सजाकर लाते, पर क्रांतिकारी थाली फेंक देते। स्व. बिहारी लाल दीवाना लिखते हैं कि 26 जुलाई 1929 को डॉक्टरों ने यतिन्द्रनाथ की नाक में नली डालकर जबरदस्ती दूध पिलाने की कोशिश की। उन्होंने नली को दांतों में दबा लिया। दूसरी नली डालने पर वह फेफड़ों में चली गई और डॉक्टरों ने एक किलो दूध फेफड़ों में भर दिया। उन्हें तड़पता छोड़ डॉक्टर चले गए। होश आने पर यतिन्द्र ने कहा था – “अब मैं इनकी पकड़ में आने वाला नहीं हूँ।” उसी दिन से वे तिल-तिल मौत की ओर सरकने लगे।
स्थिति बिगड़ने पर सरकार ने भगत सिंह को केन्द्रीय कारागार से बुलाया। भगत सिंह के अनुरोध पर उन्होंने एनीमा ले लिया। जब भगत सिंह ने दवा पीने को कहा तो यतिन्द्र ने कहा – “देखो मेरे प्रिय भगत सिंह, मैं अपनी प्रतिज्ञा से पीछे हटने वाला नहीं हूँ, मैं तुम्हारा कहना भी नहीं टाल सकता। लेकिन आगे मुझसे कुछ मत कहना। जिंदगी आती रहेगी और जाती रहेगी, यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मैं अपना जीवन भारत माता के लिए बलिदान कर रहा हूँ।” आखिर 63वें दिन 13 सितंबर 1929 को दोपहर 1 बजे उनका बलिदान हो गया।
उनकी मृत्यु पर पंडित मदन मोहन मालवीय ने कहा था – “ये लोग साधारण अपराधी नहीं हैं, ये देशभक्ति की उच्च भावना से प्रेरित हैं।” पंडित नेहरू ने कहा – “यतिन्द्र ने जो किया अपनी आत्मा की आवाज पर किया।” महात्मा गांधी ने कहा था – “यदि ऐसे नौजवान कुर्बानियां देते रहे तो अंग्रेजों को भारत शीघ्र छोड़ना होगा।”
मोहम्मद अली जिन्ना ने भी भूख हड़ताल विधेयक पर बहस करते हुए कहा था – “जो व्यक्ति भूख हड़ताल का रास्ता पकड़ता है, वह आत्मा की आवाज पर न्याय और सिद्धांतों के लिए जीवन कुर्बान करता है, ऐसे लोग अपराधी नहीं होते।” उनकी शहादत के बाद 14 सितंबर 1929 को मेरठ में ऐसा जुलूस निकला जैसे सारा शहर उमड़ आया हो। (विभूति फीचर्स)


