शरद कटियार
नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स सम्मेलन से आतंकवाद के खिलाफ जो संदेश सामने आया है, वह केवल कूटनीतिक औपचारिकता भर नहीं माना जाना चाहिए। साझा घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा और आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता पर जोर यह बताता है कि आतंकवाद अब किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चुनौती है।
भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह बात उठाता रहा है कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता या विचारधारा के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और न ही उसे किसी राष्ट्र या समुदाय के नाम पर सही ठहराया जा सकता है। जब निर्दोष लोगों को निशाना बनाया जाता है, तब मानवता पर हमला होता है। इसलिए आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई भी सीमाओं और राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर होनी चाहिए।
पहलगाम हमला भारत के लिए केवल एक आतंकी घटना नहीं था, बल्कि उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि आखिर आतंकवादी संगठनों को संसाधन, पैसा, हथियार और सुरक्षित ठिकाने कहां से मिलते हैं। केवल हमलावरों को पकड़ लेना आतंकवाद की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। जब तक आतंकवाद की आर्थिक रीढ़ नहीं तोड़ी जाती, तब तक इसके नेटवर्क किसी न किसी रूप में सक्रिय रहने का खतरा बना रहेगा।
यही वजह है कि ब्रिक्स घोषणापत्र में आतंकी फंडिंग करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग महत्वपूर्ण है। आतंकवाद को धन उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति, संगठन या नेटवर्क प्रत्यक्ष रूप से हमले में शामिल न हों, फिर भी उनकी भूमिका कम गंभीर नहीं होती। आतंकवादी गतिविधियों के लिए धन उपलब्ध कराने वालों पर कार्रवाई आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दुनिया को अब यह भी तय करना होगा कि आतंकवाद के खिलाफ नीति केवल बयान जारी करने तक सीमित न रहे। यदि किसी देश की धरती का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए होता है, यदि किसी संगठन को आर्थिक सहायता मिलती है या आतंकवादियों को संरक्षण मिलता है, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उसके खिलाफ सामूहिक और प्रभावी कार्रवाई का रास्ता अपनाना होगा।
ब्रिक्स का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह मंच दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ लाता है। यदि ये देश आतंकवाद, कट्टरपंथ, आतंकी वित्तपोषण और संगठित अपराध के खिलाफ अपने तंत्र को मजबूत करते हैं, तो इसका असर वैश्विक स्तर पर दिखाई दे सकता है।
भारत के लिए इस घोषणापत्र का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ उसकी लड़ाई लंबे समय से जारी है। भारत ने लगातार यह स्पष्ट किया है कि आतंकवाद और उसके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई में दोहरा मापदंड नहीं होना चाहिए। एक ओर आतंकवाद की निंदा और दूसरी ओर आतंकवादियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन,यह विरोधाभास अब ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता।
ब्रिक्स की यह पहल तभी सार्थक होगी जब घोषणापत्र के शब्द जमीन पर कार्रवाई में बदलें। आतंकवाद के खिलाफ खुफिया सहयोग बढ़े, आतंकी फंडिंग के रास्ते बंद हों, आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकानों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बने और दोषियों को कानून के दायरे में लाया जाए।
आज दुनिया को आतंकवाद के खिलाफ एक ऐसी साझा नीति की जरूरत है जिसमें हमलावर और उसके पीछे खड़े तंत्र के बीच कोई फर्क न किया जाए। पहलगाम की त्रासदी ने एक बार फिर याद दिलाया है कि आतंकवाद को रोकने के लिए केवल संवेदना पर्याप्त नहीं है।


