– सुहागिनें रखेंगी निर्जला व्रत, शिव-पार्वती की पूजा के साथ चंद्रमा को देंगी अर्घ्य
डॉ. पंकज चतुर्वेदी
लखनऊ। सुहागिन महिलाओं के प्रमुख पर्वों में शामिल कजरी तीज इस बार सोमवार, 14 सितंबर को मनाई जाएगी। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को पड़ने वाले इस पर्व को बजरी तीज, सातुड़ी तीज और बूढ़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन तथा दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
इस बार कजरी तीज का सोमवार के दिन पड़ना विशेष संयोग माना जा रहा है। सोमवार भगवान शिव को समर्पित दिन है, इसलिए शिव-पार्वती की आराधना करने वाली महिलाओं में इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह है। राजधानी लखनऊ के चौक और अमीनाबाद बाजारों में सोलह श्रृंगार की सामग्री तथा सत्तू की खरीदारी शुरू हो गई है। वहीं धार्मिक स्थलों पर भी विशेष पूजा-अर्चना की तैयारियां की जा रही हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी मान्यता के चलते कजरी तीज पर सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, अखंड सौभाग्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं।
कजरी तीज की एक खास पहचान कजरी गीत भी हैं। सावन-भादों के मौसम में काले बादलों और हरियाली के बीच महिलाएं पारंपरिक कजरी गीत गाकर पर्व की खुशियां मनाती हैं।
कजरी तीज के दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और सोलह श्रृंगार करके व्रत का संकल्प लेती हैं। कई महिलाएं अपनी सामर्थ्य और परंपरा के अनुसार निर्जला व्रत रखती हैं।
पूजा के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की मिट्टी की प्रतिमा, चौकी, लाल कपड़ा, कलश, दीपक, घी, रोली, अक्षत, बेलपत्र, भांग, धतूरा, सोलह श्रृंगार की सामग्री, फल, मिठाई और सत्तू तैयार किया जाता है।
कजरी तीज की परंपराओं में नीमड़ी पूजा का भी विशेष महत्व है। घर में गोबर से प्रतीकात्मक तालाब बनाकर उसमें नीम की टहनी लगाई जाती है। इसके बाद नीमड़ी माता की पूजा-अर्चना की जाती है। यह पूजा भी व्रत की पारंपरिक विधि का हिस्सा मानी जाती है।
शाम के समय चौकी पर भगवान शिव और माता पार्वती सहित शिव परिवार की स्थापना की जाती है। भगवान शिव को जल और बेलपत्र अर्पित किए जाते हैं, जबकि माता पार्वती को सोलह श्रृंगार की सामग्री चढ़ाई जाती है।
पूजा में सत्तू के चार लड्डू बनाने और उनका भोग लगाने की भी परंपरा है। इसके बाद कजरी तीज की कथा सुनी जाती है और भगवान शिव-पार्वती की आरती की जाती है।
रात्रि में चंद्रमा के दर्शन होने पर महिलाएं दूध, जल और रोली से चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं। इसके बाद सत्तू का भोग लगाया जाता है। परंपरा के अनुसार पति के हाथ से जल ग्रहण करके व्रत का पारण किया जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि कजरी तीज का व्रत करने से पति की दीर्घायु, दांपत्य जीवन में प्रेम और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना पूरी होती है। इस बार पर्व के दिन सोमवार होने से श्रद्धालु इसे भगवान शिव की आराधना के लिहाज से विशेष शुभ मान रहे हैं।


