बीना निगम
शिक्षिका, बाल भारती पब्लिक स्कूल, सीपत
> “सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय॥”
संत कबीर की ये पंक्तियां गुरु की महिमा को शब्दों में व्यक्त करने की हमारी सीमाओं को सामने रखती हैं। सच भी है, शिक्षक के योगदान को किसी एक दिन, एक आयोजन या कुछ शब्दों में समेटना संभव नहीं। शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि विद्यार्थी के व्यक्तित्व, संस्कार, सोच और चरित्र का निर्माता होता है।
बचपन में विद्यालय में गाई जाने वाली पंक्तियां,“शिक्षक नई सुबह का सूरज, नई रोशनी का निर्माता, वह पारस मणि है, जिसको छूकर लोहा कंचन बन जाता है”,तब महज गीत की पंक्तियां लगती थीं। समय के साथ जब जीवन को समझने का अवसर मिला, तब इन शब्दों का वास्तविक अर्थ समझ में आया। शिक्षक सचमुच वह प्रकाश है, जो स्वयं ज्ञान का दीप जलाकर अनेक विद्यार्थियों के जीवन को रोशन करता है।
आज का युग सूचना और तकनीक का युग है। मोबाइल, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से कुछ ही क्षणों में दुनिया भर की जानकारी हमारे सामने उपलब्ध हो जाती है। विद्यार्थी के पास ज्ञान के स्रोत पहले से कहीं अधिक हैं। ऐसे समय में शिक्षक की भूमिका कम नहीं हुई, बल्कि और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
इंटरनेट हमें हजारों उत्तर दे सकता है, लेकिन कौन-सा उत्तर सही है, कौन-सी जानकारी उपयोगी है और किस जानकारी से बचना चाहिए—यह विवेक शिक्षक विकसित करता है। तकनीक जानकारी दे सकती है, लेकिन उसके सही उपयोग की दृष्टि देने का काम शिक्षक ही करता है।
शिक्षक पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं होता। वह विद्यार्थी को जीवन की परिस्थितियों से सामना करना सिखाता है। वह उसकी क्षमताओं को पहचानता है, उसकी कमियों को सुधारता है और उसमें आत्मविश्वास पैदा करता है। ज्ञान के साथ व्यवहार, अनुशासन, संवेदनशीलता, सह-अस्तित्व, जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों का विकास भी शिक्षा का ही हिस्सा है।
प्रकृति स्वयं हमारी महान शिक्षिका है। धरती हमें धैर्य सिखाती है, आकाश विशाल सोच की प्रेरणा देता है, अग्नि कर्मठता और तेज का संदेश देती है, जल निर्मलता और वायु स्वतंत्रता का बोध कराती है। उसी प्रकार एक शिक्षक अपने आचरण से विद्यार्थियों को जीवन के वे पाठ पढ़ाता है, जिन्हें किसी किताब में पूरी तरह नहीं लिखा जा सकता।
एक अच्छे शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसके विद्यार्थी ने कितने अंक प्राप्त किए या कितनी जानकारी अर्जित की। उसकी वास्तविक सफलता तब है, जब उसका विद्यार्थी ज्ञानवान होने के साथ संवेदनशील, जिम्मेदार और बेहतर इंसान बने।
आज जब बच्चों के सामने सूचनाओं की भरमार है, सोशल मीडिया की तेज दुनिया है और सही-गलत के बीच अंतर करना लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है, तब शिक्षक की भूमिका एक दिशासूचक दीपक की तरह हो जाती है। वह विद्यार्थी को केवल यह नहीं बताता कि क्या पढ़ना है, बल्कि यह भी सिखाता है कि कैसे सोचना है।
शिक्षक दिवस के अवसर पर महान शिक्षाविद् और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को नमन करते हुए उन सभी गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हमारा दायित्व है, जिन्होंने अपने ज्ञान, अनुशासन, स्नेह और संस्कार से असंख्य जीवनों को दिशा दी।
शिक्षक वह दीप है, जो स्वयं जलकर दूसरों के जीवन में प्रकाश भरता है।
और शायद शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान यही है कि उसके पढ़ाए विद्यार्थी जब जीवन में आगे बढ़ते हैं, तब उनके व्यक्तित्व में कहीं न कहीं उनके गुरु की छवि दिखाई देती है।


