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Wednesday, August 26, 2026

आरक्षण सुविधा नहीं, बराबरी का माध्यम बने

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प्रो. एच. एन. शर्मा
आज देश में आरक्षण को लेकर बहस केवल जाति और नौकरी तक सीमित नहीं रह गई है। इसके साथ सरकारी व्यवस्था में मिलने वाली सुविधाओं, अवसरों की समानता और उन परिवारों तक लाभ पहुंचने का सवाल भी जुड़ गया है, जो वास्तव में सबसे पीछे हैं।
आज एक सरकारी कर्मचारी और एक आम निजी दुकानदार, किसान या स्वरोजगार करने वाले व्यक्ति के जीवन में सुविधाओं का बड़ा अंतर दिखाई देता है। सरकारी कर्मचारी को नौकरी की अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षा, सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभ, सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं, आवास या आवास संबंधी सुविधाएं तथा बच्चों की शिक्षा से जुड़े विभिन्न अवसर मिल सकते हैं। दूसरी ओर, आम किसान, दुकानदार और छोटे कारोबारी को अपनी आय और भविष्य की सुरक्षा स्वयं सुनिश्चित करनी पड़ती है।
इसी अंतर के कारण समाज में एक सोच मजबूत होती जा रही है,मालिक बनने से अच्छा है नौकर बन जाओ, क्योंकि नौकर को मालिक से ज्यादा सुरक्षा और सुविधाएं मिलती हैं।
यही वह बिंदु है जहां आरक्षण की बहस को केवल जातिगत राजनीति के चश्मे से देखने के बजाय व्यापक सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से देखने की जरूरत है। जब सरकारी नौकरी केवल रोजगार न रहकर सामाजिक सुरक्षा और अनेक सुविधाओं का रास्ता बन जाती है, तो स्वाभाविक रूप से हर वर्ग सरकारी नौकरी में अपना हिस्सा चाहता है। परिणाम यह होता है कि आरक्षण की मांग लगातार नए-नए रूपों में सामने आती रहती है।
क्या ऐसा नहीं होना चाहिए कि देश में सुविधा का आधार पद नहीं, बल्कि नागरिकता और जरूरत हो?
एक व्यापक ‘एक देश, एक सुविधा’ की अवधारणा पर गंभीर राष्ट्रीय बहस हो सकती है। सांसद हो या विधायक, वरिष्ठ अधिकारी हो या सामान्य कर्मचारी—स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं में ऐसी व्यवस्था हो जिसमें आम नागरिक और जनप्रतिनिधि के बीच अनावश्यक अंतर न हो।
यदि देश के नीति-निर्माता उसी सरकारी अस्पताल में इलाज कराएं, जहां आम नागरिक इलाज कराता है; उनके बच्चों की शिक्षा के लिए भी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा हो और आम नागरिक की तरह सार्वजनिक सुविधाओं की गुणवत्ता का अनुभव उन्हें भी करना पड़े, तो व्यवस्था को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी और बढ़ेगी।
हालांकि पद की प्रकृति के कारण सुरक्षा, आधिकारिक वाहन, आवास और अन्य आवश्यक सुविधाओं में अंतर स्वाभाविक रूप से रह सकता है। लेकिन सुविधाओं की ऐसी खाई, जिसमें आम नागरिक स्वयं को दोयम दर्जे का महसूस करे, लोकतंत्र के लिए स्वस्थ नहीं है।
आरक्षण को केवल सरकारी नौकरी की सुविधा के रूप में देखना ऐतिहासिक रूप से अधूरा दृष्टिकोण होगा। भारतीय समाज में लंबे समय तक अनेक समुदायों को शिक्षा, सामाजिक सम्मान और अवसरों से वंचित रखा गया। इसलिए आरक्षण का मूल उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति को नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व, अवसर की समानता और ऐतिहासिक असमानता को कम करना भी है।
जिन लोगों को पीढ़ियों तक शिक्षा और अवसरों से दूर रखा गया, उन्हें समान अवसर की दौड़ में लाने के लिए संवैधानिक संरक्षण की आवश्यकता थी और आज भी सामाजिक न्याय के संदर्भ में इसकी भूमिका पर बहस जरूरी है।
लेकिन इसके साथ एक दूसरा प्रश्न भी उतनी ही मजबूती से उठना चाहिए,क्या आरक्षण का लाभ लगातार उन्हीं परिवारों तक सीमित होता जाए जो पहले ही इसका लाभ लेकर सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुके हैं?
यदि किसी आरक्षित वर्ग का एक परिवार आरक्षण के माध्यम से शिक्षा, नौकरी, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक स्थिति में काफी आगे बढ़ चुका है, जबकि उसी वर्ग का दूसरा परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है, तो नीति की समीक्षा का सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसलिए एक विचार यह हो सकता है कि आरक्षण का लाभ परिवार-केंद्रित और अवसर-केंद्रित तरीके से अधिक प्रभावी बनाया जाए। अर्थात जिस परिवार को एक पीढ़ी में आरक्षण के माध्यम से पर्याप्त अवसर और स्थिरता मिल चुकी है, उसके बाद उसी परिवार के बजाय उसी समुदाय के अधिक वंचित परिवारों को प्राथमिकता देने की व्यवस्था पर विचार किया जाए।
यह विचार किसी वर्ग से उसका अधिकार छीनने के लिए नहीं, बल्कि आरक्षण के लाभ को अधिक व्यापक बनाने के लिए है।
‘एक परिवार, एक बार’ जैसी व्यवस्था पर भी राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर संवैधानिक और सामाजिक विमर्श होना चाहिए। हालांकि इसे लागू करने से पहले यह तय करना आवश्यक होगा कि परिवार की परिभाषा क्या होगी, किस स्तर की उपलब्धि के बाद लाभ समाप्त माना जाएगा और वास्तव में वंचित परिवारों की पहचान कैसे होगी।
आरक्षण की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने लोगों को नौकरी मिली। इसकी सफलता इस बात से मापी जानी चाहिए कि जिन लोगों को सबसे अधिक जरूरत थी, उनमें से कितने लोग आगे आए।
अगर आरक्षण का लाभ बार-बार एक ही सक्षम परिवारों तक पहुंचता रहे और उसी वर्ग के अत्यंत गरीब, ग्रामीण, भूमिहीन या अवसरों से वंचित परिवार पीछे रह जाएं, तो व्यवस्था के भीतर सुधार की गुंजाइश जरूर है।
सामाजिक न्याय का अर्थ यह नहीं कि किसी को हमेशा पीछे रखा जाए और किसी को हमेशा आगे। सामाजिक न्याय का वास्तविक अर्थ है,जो पीछे है, उसे आगे आने का अवसर मिले।
देश में सरकारी नौकरी का सम्मान होना चाहिए, लेकिन उसे ऐसी व्यवस्था नहीं बनना चाहिए जिसमें नौकरी मिलते ही व्यक्ति और उसके परिवार को सामान्य नागरिक से अलग जीवन मिलने लगे।
सरकारी कर्मचारी देश की सेवा करते हैं और उन्हें उचित वेतन, सुरक्षा तथा आवश्यक सुविधाएं मिलनी ही चाहिए। लेकिन किसान, मजदूर, दुकानदार, व्यापारी और स्वरोजगार करने वाले नागरिक भी देश की अर्थव्यवस्था और समाज की रीढ़ हैं। उनकी सामाजिक सुरक्षा और सम्मान पर भी उतना ही ध्यान दिया जाना चाहिए।
जब हर नागरिक को बेहतर स्वास्थ्य, अच्छी शिक्षा, सम्मानजनक परिवहन, सामाजिक सुरक्षा और न्यायपूर्ण अवसर मिलेंगे, तब सरकारी नौकरी के पीछे भागने का दबाव भी कम होगा।
फिर युवा केवल यह नहीं सोचेंगे कि ‘सरकारी नौकरी कैसे मिले?’ बल्कि यह भी सोचेंगे कि ‘मैं अपनी प्रतिभा और मेहनत से खेती, व्यापार, उद्योग या निजी क्षेत्र में कैसे आगे बढ़ूं?’
यही संतुलन एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था और मजबूत लोकतंत्र की पहचान होगा।
आरक्षण रहे, लेकिन उसका लाभ अंतिम और सबसे वंचित व्यक्ति तक पहुंचे। सरकारी सुविधाएं रहें, लेकिन उनमें अनावश्यक वीआईपी संस्कृति खत्म हो। सरकारी नौकरी सम्मानजनक रहे, लेकिन आम नागरिक का जीवन भी उतना ही सुरक्षित और सम्मानजनक बने।
क्योंकि लक्ष्य किसी से सुविधा छीनना नहीं होना चाहि,लक्ष्य यह होना चाहिए कि देश में सुविधा, अवसर और सम्मान की खाई इतनी कम हो जाए कि किसी बच्चे को अपना भविष्य केवल आरक्षण या सरकारी नौकरी के भरोसे तय न करना पड़े।यही सामाजिक न्याय की दिशा में अगला बड़ा कदम हो सकता है।
– लेखक पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर के राजनैतिक सलाहकार रहे हैं।

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