शरद कटियार
देश में पेंशन का सवाल एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में होना चाहिए। सवाल सीधा है—जिस सरकारी कर्मचारी ने 30-35 साल तक सरकार की सेवा की, उसकी पेंशन व्यवस्था को अंशदायी बना दिया गया, लेकिन सांसद और विधायक पद छोड़ने के बाद पेंशन के हकदार क्यों बने रहें?
यह सवाल किसी व्यक्ति या दल के खिलाफ नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें जनप्रतिनिधियों की पेंशन का आधार और सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति सुरक्षा का आधार अलग-अलग दिखाई देता है।
उत्तर प्रदेश में 1 अप्रैल 2005 से राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) लागू है। प्रदेश सरकार ने विधान परिषद में दिए जवाब में स्पष्ट किया है कि 1 अप्रैल 2005 से पहले कार्यभार ग्रहण करने वाले कर्मचारियों को पुरानी पेंशन अनुमन्य है, जबकि उसके बाद नियुक्त अधिकांश कर्मचारी एनपीएस के दायरे में हैं। हालांकि, कुछ ऐसे कर्मचारियों को पुरानी पेंशन में शामिल करने के लिए विशेष विकल्प भी दिए गए हैं, जिनकी भर्ती का विज्ञापन निर्धारित कटऑफ से पहले जारी हो चुका था।
केंद्र में भी एनपीएस के तहत कर्मचारी अपने मूल वेतन और महंगाई भत्ते का 10 प्रतिशत अंशदान करता है और सरकार 14 प्रतिशत योगदान देती है। यानी नई व्यवस्था में कर्मचारी की सेवानिवृत्ति आय उसके अंशदान और निवेश से जुड़ी है।
अब दूसरी तस्वीर देखिए।
संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम, 1954 की धारा 8ए के तहत कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन का सदस्य किसी भी अवधि के लिए रहा हो तो उसे पेंशन का अधिकार है। 2025 की केंद्र सरकार की अधिसूचना के अनुसार सांसद की पेंशन 31 हजार रुपये प्रतिमाह हो गई है। पांच वर्ष से अधिक की सेवा पर प्रत्येक अतिरिक्त वर्ष के लिए 2,500 रुपये प्रतिमाह अतिरिक्त पेंशन का प्रावधान है।
अर्थात पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाला सांसद मूल पेंशन के रूप में 31 हजार रुपये मासिक का हकदार है और लंबी संसदीय सेवा पर अतिरिक्त राशि भी मिलती है।
यहां सवाल उठना स्वाभाविक है,क्या सांसद की पेंशन में भी कोई कर्मचारी अंशदान करता है? वर्तमान केंद्रीय व्यवस्था में सांसद की पेंशन कर्मचारी के एनपीएस जैसे अंशदान मॉडल पर आधारित नहीं है। इसका प्रावधान संसद द्वारा बनाए गए कानून में है।
उत्तर प्रदेश ने अगस्त 2025 में विधायकों, मंत्रियों और पूर्व सदस्यों के वेतन-भत्तों में संशोधन किया। इसके बाद पूर्व विधायक की पेंशन 25 हजार से बढ़ाकर 35 हजार रुपये प्रतिमाह किए जाने की जानकारी विधानसभा में दी गई। पारिवारिक पेंशन भी 25 हजार से बढ़ाकर 30 हजार रुपये की गई। इस संशोधन से राज्य के खजाने पर सालाना करीब 105.21 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने की जानकारी सरकार की ओर से दी गई।
यानी एक तरफ कर्मचारी से कहा जाता है कि सेवानिवृत्ति की सुरक्षा के लिए अपने वेतन से अंशदान करो, दूसरी तरफ पूर्व विधायक को अलग वैधानिक व्यवस्था के तहत पेंशन मिलती है।
यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि सांसद और विधायक सरकारी कर्मचारी नहीं होते। यह बात सही है। वे संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं और उनकी वेतन-भत्ता तथा पेंशन व्यवस्था अलग कानूनों से संचालित होती है।
लेकिन सवाल फिर भी कायम रहता है,जब एक सामान्य कर्मचारी के लिए पेंशन को अंशदान से जोड़ना वित्तीय अनुशासन है, तो जनप्रतिनिधियों के लिए अंशदान आधारित पेंशन व्यवस्था पर विचार क्यों नहीं हो सकता?
लोकतंत्र में जनता के प्रतिनिधियों को सुविधाएं मिलना गलत नहीं है। चुनाव लड़ना, जनप्रतिनिधित्व करना और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहना आसान काम नहीं है। लेकिन जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं पर अंतिम नैतिक कसौटी वही होनी चाहिए जो आम नागरिक के लिए है,न्याय, पारदर्शिता और समानता।
कई राज्यों में विधायक पेंशन की व्यवस्था अलग-अलग है। कहीं एक कार्यकाल के बाद पेंशन मिलती है, कहीं कार्यकाल के वर्षों के आधार पर अतिरिक्त राशि जुड़ती है। इसलिए पूरे देश के लिए एक ही आंकड़ा देना सही नहीं होगा।
लेकिन सिद्धांत का सवाल राष्ट्रीय है,क्या एक बार निर्वाचित होना अपने आप जीवनभर पेंशन का अधिकार पैदा कर देना चाहिए?
यदि कोई व्यक्ति विधायक रहा, फिर सांसद बन गया, फिर किसी अन्य संवैधानिक पद पर चला गया, तो अलग-अलग पेंशन और सुविधाओं की संभावनाएं व्यवस्था को और जटिल बनाती हैं। ऐसे मामलों में “एक व्यक्ति एक सार्वजनिक पेंशन” जैसी नीति पर भी विचार किया जा सकता है।
कर्मचारी संगठनों की पुरानी पेंशन की मांग का मूल तर्क यही है कि सेवानिवृत्ति के बाद निश्चित सामाजिक सुरक्षा होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश विधान परिषद में सरकार ने भी स्वीकार किया है कि 1 अप्रैल 2005 से प्रदेश में एनपीएस लागू है और पुरानी पेंशन बहाली के लिए कर्मचारी संगठनों की ओर से मांगें प्राप्त हुई हैं।
केंद्र ने अब एनपीएस के साथ एकीकृत पेंशन योजना का विकल्प भी उपलब्ध कराया है, जिसमें पात्र कर्मचारियों के लिए सुनिश्चित भुगतान की व्यवस्था है। पेंशन व्यवस्था पर सरकारों का प्रयोग जारी है।
लेकिन इस पूरी बहस में एक असहज प्रश्न बार-बार सामने आता है,जिस कर्मचारी से कहा गया कि पुरानी पेंशन अब वित्तीय रूप से संभव नहीं, उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित प्रतिनिधियों की पेंशन व्यवस्था को उसी वित्तीय कसौटी पर क्यों नहीं परखा जाता?
बहस को केवल “पेंशन बंद करो” तक सीमित करने के बजाय एक व्यावहारिक मॉडल पर विचार होना चाहिए।
पहला, सांसद और विधायक अपनी पेंशन में भी निर्धारित अंशदान दें।
दूसरा, पेंशन को कार्यकाल और सेवा की वास्तविक अवधि से जोड़ा जाए।
तीसरा, एक व्यक्ति को अलग-अलग निर्वाचित पदों से मिलने वाली पेंशन के लिए अधिकतम सीमा तय हो।
चौथा, यदि कोई पूर्व सांसद या विधायक पहले से किसी सरकारी पेंशन का लाभ ले रहा है तो दोहरी पेंशन की व्यवस्था की समीक्षा हो।
पांचवां, पेंशन और सुविधाओं की पूरी जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हो, ताकि जनता को पता रहे कि उसके प्रतिनिधियों पर सार्वजनिक धन कितना खर्च हो रहा है।
यह मुद्दा किसी कर्मचारी बनाम सांसद-विधायक की लड़ाई नहीं बनाया जाना चाहिए। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि भी सम्मान के अधिकारी हैं और कर्मचारी भी।
लेकिन जिस देश में करोड़ों लोग अपनी वृद्धावस्था की सुरक्षा के लिए बचत करते हैं, किसान अपनी आय के भरोसे जीवन काटता है और निजी क्षेत्र का कर्मचारी अपनी सेवानिवृत्ति के लिए स्वयं निवेश करता है, वहां जनप्रतिनिधियों की पेंशन व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पेंशन सम्मान है तो यह सम्मान व्यवस्था बनाने वाले और व्यवस्था चलाने वाले दोनों के लिए समान कसौटी पर क्यों न हो?
सांसद और विधायक पेंशन के पात्र हों या नहीं,इसका अंतिम फैसला संसद और विधानसभाओं को करना है। लेकिन फैसला करने से पहले एक बार उन्हें उस कर्मचारी की आंखों में भी देखना चाहिए, जिसने सरकारी सेवा में अपना पूरा जीवन लगा दिया और अब अपनी पेंशन के भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं है।
लोकतंत्र में विशेषाधिकार हो सकते हैं, लेकिन जनता के प्रतिनिधियों के लिए भी सबसे बड़ा सिद्धांत यही होना चाहिए,जो व्यवस्था आम नागरिक के लिए उचित मानी जाती है, उसकी कसौटी जनप्रतिनिधियों पर भी लागू हो।
यही सवाल आज देश पूछ रहा है “सरकारी मुलाजिम की पेंशन में बदलाव जरूरी था, तो सांसद-विधायक की पेंशन व्यवस्था पर वही सवाल क्यों नहीं?”


