डॉ. विजय गर्ग
सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है। यह समाज का आईना, संस्कृति का कथाकार और बदलते सामाजिक मूल्यों का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है। कई दशकों तक भारतीय सिनेमा ने त्योहारों, परंपराओं, पारिवारिक रिश्तों और सांस्कृतिक जीवन को पर्दे पर जीवंत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गीत-संगीत, उत्सव, रीति-रिवाज, पारंपरिक वेशभूषा, खान-पान और सामूहिक समारोह फिल्मों का अभिन्न हिस्सा रहे हैं और उन्होंने दर्शकों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का काम किया है।
लेकिन आज सिनेमा का बदलता परिदृश्य एक अलग कहानी कहता है। कहानी कहने के तरीकों, दर्शकों की पसंद और सामाजिक जीवन में बदलाव के साथ पारंपरिक त्योहारों को मुख्यधारा की फिल्मों में पहले की तुलना में कम स्थान मिलता दिखाई देता है। दीपावली, होली, दशहरा, बैसाखी, लोहड़ी, पोंगल, ओणम, ईद और देश के अनेक क्षेत्रीय त्योहार, जो कभी फिल्मों में भावनात्मक और सांस्कृतिक गहराई जोड़ते थे, अब धीरे-धीरे हाशिए की ओर जाते दिखाई देते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय सिनेमा से त्योहार पूरी तरह गायब हो गए हैं। वे आज भी फिल्मों, टेलीविजन, संगीत वीडियो और डिजिटल सामग्री में दिखाई देते हैं। लेकिन उनकी भूमिका बदल गई है। पहले किसी फिल्म में त्योहार का दृश्य केवल सजावट नहीं होता था। वह परिवार के पुनर्मिलन, भावनात्मक मुलाकात, पुराने मतभेदों को दूर करने, खुशी बांटने और सामाजिक मेल-जोल का महत्वपूर्ण अवसर बन सकता था। आज कई बार त्योहार केवल पृष्ठभूमि, छोटे दृश्य या व्यावसायिक प्रस्तुति तक सीमित रह जाते हैं।
इस बदलाव का एक प्रमुख कारण भारतीय परिवार की बदलती संरचना है। पुरानी फिल्मों में अक्सर बड़े परिवारों को साथ रहते हुए दिखाया जाता था, जहां त्योहार दादा-दादी, माता-पिता, बच्चों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों को एक साथ लाने का अवसर बनते थे। त्योहार सामूहिक खुशी का प्रतीक था। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवारों का बढ़ना, शहरी जीवनशैली और रोजगार के लिए पलायन ने त्योहार मनाने के सामाजिक अनुभव को भी बदल दिया है। सिनेमा स्वाभाविक रूप से इन परिवर्तनों को प्रतिबिंबित करता है।
डिजिटल मनोरंजन के विस्तार ने कहानी कहने की शैली को और बदल दिया है। दर्शक अब फिल्मों और वेब सीरीज को अनेक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर देखते हैं और अक्सर तेज गति वाली कहानियों को प्राथमिकता देते हैं। निर्माताओं के सामने दर्शकों का ध्यान बनाए रखने की चुनौती है। ऐसे वातावरण में लंबे सांस्कृतिक दृश्य, त्योहार की तैयारियां, पारंपरिक रस्में और पारिवारिक मिलन के दृश्य कम समय पा सकते हैं।
सिनेमा पर व्यावसायिक दबाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। निर्माता अक्सर ऐसे विषयों को प्राथमिकता देते हैं जिन्हें विभिन्न क्षेत्रों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में व्यापक दर्शक मिल सकें। किसी विशेष क्षेत्र का त्योहार दूसरे क्षेत्र के दर्शकों के लिए अपरिचित हो सकता है, जबकि महत्वाकांक्षा, रिश्ते, अपराध, तकनीक या व्यक्तिगत संघर्ष जैसे विषय अधिक सार्वभौमिक माने जाते हैं। परिणामस्वरूप, व्यापक व्यावसायिक अपील के लिए सांस्कृतिक विशिष्टता कभी-कभी पीछे छूट जाती है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है—जब सिनेमा धीरे-धीरे अपने सांस्कृतिक परिवेश को खोने लगे तो क्या होता है?
समाज अपनी संस्कृति को केवल पुस्तकों और संग्रहालयों के माध्यम से सुरक्षित नहीं रखता। संस्कृति रोजमर्रा के अनुभवों, कहानियों, गीतों, भोजन, वेशभूषा, रीति-रिवाजों और सामूहिक स्मृतियों में जीवित रहती है। सिनेमा इन तत्वों को दृश्य और भावनात्मक रूप से संरक्षित करने की अनूठी क्षमता रखता है। एक फिल्म ऐसी परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचा सकती है जिसे वह पीढ़ी शायद उसी रूप में अनुभव न कर पाए।
त्योहार इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे केवल धार्मिक या पारंपरिक आयोजन नहीं होते। वे लोगों को मिलने, साथ बैठने, भोजन साझा करने, शुभकामनाएं देने, पुराने मतभेद भुलाने और रिश्तों को मजबूत करने का अवसर देते हैं। वे पीढ़ियों को जोड़ते हैं। दादा-दादी बच्चों को परंपराओं के बारे में बताते हैं, माता-पिता पारिवारिक संस्कार अगली पीढ़ी तक पहुंचाते हैं और समुदाय सामूहिक उत्सव में एक-दूसरे के करीब आते हैं।
जब सिनेमा ऐसे क्षणों को सार्थक ढंग से प्रस्तुत करता है, तो वह केवल मनोरंजन नहीं करता—वह सामाजिक इतिहास को भी दर्ज करता है।
पुरानी फिल्मों में त्योहारों के चित्रण को याद करें। किसी घर का सजा हुआ आंगन, पारंपरिक भोजन बनाते परिवार के सदस्य, नए कपड़े पहने बच्चे, एक-दूसरे के घर जाते पड़ोसी और वातावरण में गूंजता संगीत—ये दृश्य अपनापन और सामूहिकता का अनुभव कराते थे। ऐसे दृश्य लोगों की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गए। अनेक दर्शकों के लिए सिनेमा सांस्कृतिक परंपराओं को देखने और समझने की खिड़की बन गया।
इसके विपरीत, आधुनिक सिनेमा में अक्सर अधिक व्यक्तिगत जीवन दिखाई देता है। मुख्य पात्र किसी बड़े शहर में अकेला रह सकता है, काम के दबाव से जूझ सकता है, रिश्तों की उलझनों से गुजर सकता है या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में लगा हो सकता है। ये कहानियां गलत नहीं हैं; वे आधुनिक जीवन की वास्तविकताओं को सामने रखती हैं। लेकिन जब व्यक्तिगत जीवन और व्यक्तिवाद प्रमुख कथानक बन जाते हैं, तब संस्कृति का सामूहिक पक्ष अपेक्षाकृत कम दिखाई दे सकता है।
त्योहारों का बढ़ता व्यावसायीकरण भी एक महत्वपूर्ण कारण है। त्योहार अब बड़े उपभोक्ता आयोजनों का रूप लेते जा रहे हैं। विज्ञापन, खरीदारी अभियान, सोशल मीडिया ट्रेंड और ब्रांड प्रचार कई बार उत्सव की मूल भावना पर हावी हो जाते हैं। सिनेमा भी इसी व्यावसायिक वातावरण का हिस्सा है। ऐसे में यह खतरा पैदा होता है कि त्योहारों का गहरा सांस्कृतिक अर्थ उपभोग, विलासिता और दिखावे की तस्वीरों में बदल जाए।
त्योहार केवल महंगे कपड़ों, सजावट, उपहारों या पार्टियों के लिए याद नहीं किए जाने चाहिए। उनका वास्तविक महत्व रिश्तों, कृतज्ञता, समुदाय, परंपरा और साझा खुशी में है। सिनेमा में इतनी शक्ति है कि वह दर्शकों को इस अंतर का एहसास करा सके।
हालांकि हमें अतीत को पूरी तरह आदर्श भी नहीं मानना चाहिए। सभी पारंपरिक प्रथाएं समान रूप से समावेशी नहीं थीं और सामाजिक प्रगति के साथ अनेक परंपराओं में सकारात्मक बदलाव आवश्यक भी रहे हैं। केवल पुराना होने के कारण हर परंपरा को बचाए रखना जरूरी नहीं है। संस्कृति को समय के साथ विकसित होना चाहिए। उद्देश्य समाज को अतीत में स्थिर कर देना नहीं, बल्कि सार्थक मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए परंपराओं को समय के अनुरूप बदलने देना होना चाहिए।
यहीं समकालीन फिल्मकारों के सामने एक महत्वपूर्ण अवसर है।
सिनेमा केवल पुराने त्योहारों के दृश्यों को दोहराने के बजाय उन्हें आधुनिक कहानियों के साथ जोड़ सकता है। कोई फिल्म दिखा सकती है कि घर से दूर रहने वाला प्रवासी परिवार अपने त्योहार को किस तरह मनाता है। कोई कहानी शहर में पले-बढ़े बच्चों के अपने दादा-दादी की परंपराओं से दोबारा जुड़ने पर केंद्रित हो सकती है। कोई फिल्म अलग-अलग समुदायों के लोगों को मिलकर त्योहार मनाते हुए दिखाकर सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक सद्भाव का संदेश दे सकती है।
क्षेत्रीय सिनेमा की भूमिका यहां विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत एक ही सांस्कृतिक परिदृश्य नहीं है, बल्कि असंख्य सांस्कृतिक परंपराओं का विशाल संगम है। हर क्षेत्र के अपने त्योहार, लोकगीत, भोजन, हस्तशिल्प और रीति-रिवाज हैं। पंजाब की लोहड़ी, केरल का ओणम, तमिलनाडु का पोंगल, असम का बिहू, महाराष्ट्र के गणेश उत्सव और देश के अनेक अन्य क्षेत्रीय पर्व कहानी कहने के लिए समृद्ध सामग्री उपलब्ध कराते हैं।
डिजिटल युग सांस्कृतिक कहानियों के लिए नए अवसर भी पैदा कर रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल सिनेमाघरों की सीमाओं तक बंधे नहीं हैं। किसी एक क्षेत्र की कहानी देश और दुनिया के दूसरे हिस्सों के दर्शकों तक पहुंच सकती है। किसी दूसरे प्रदेश के दर्शक के लिए अपरिचित त्योहार भी एक रोचक सांस्कृतिक अनुभव बन सकता है।
युवा पीढ़ी को भी परंपराओं से पूरी तरह कटा हुआ मान लेना उचित नहीं है। युवा संस्कृति में रुचि ले सकते हैं, बशर्ते उसे आधुनिक, प्रामाणिक और रोचक तरीके से प्रस्तुत किया जाए। समस्या शायद रुचि की कमी नहीं, बल्कि सार्थक प्रस्तुति की कमी है।
स्कूल, परिवार और सांस्कृतिक संस्थाएं भी सिनेमा की भूमिका को मजबूत कर सकती हैं। बच्चों को केवल यह जानना पर्याप्त नहीं कि कोई त्योहार कैसे मनाया जाता है; उन्हें यह भी समझना चाहिए कि वह क्यों मनाया जाता है। त्योहारों से जुड़ी कहानियों, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामाजिक मूल्यों को समझने से उत्सव केवल एक आयोजन न रहकर सांस्कृतिक शिक्षा का माध्यम बन सकता है।
सोशल मीडिया ने सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को एक नया मंच दिया है। जिन त्योहारों को मुख्यधारा के सिनेमा में कम स्थान मिलता है, वे छोटे वीडियो, तस्वीरों, डॉक्यूमेंट्री और स्वतंत्र रचनाकारों के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुंच सकते हैं। सामान्य लोग भी अपनी परंपराओं के कथाकार बन सकते हैं। सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का यह लोकतंत्रीकरण सकारात्मक परिवर्तन है।
फिर भी मुख्यधारा के सिनेमा की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण बनी रहती है, क्योंकि लोकप्रिय फिल्में भाषा, फैशन, व्यवहार और सामाजिक कल्पना को प्रभावित करती हैं। जो चीज पर्दे पर बार-बार दिखाई देती है, वह परिचित बन जाती है; जो धीरे-धीरे पर्दे से गायब हो जाती है, वह सार्वजनिक चेतना में भी कम दिखाई देने लगती है।
इसलिए सिनेमा की जिम्मेदारी दोहरी है। उसे समाज को वैसा ही दिखाना चाहिए जैसा वह है, लेकिन साथ ही समाज को उन चीजों की याद भी दिलानी चाहिए जिन्हें वह भूलने के कगार पर है।
सिनेमा से त्योहारों की कम होती उपस्थिति अपने आप में कोई संकट नहीं है। संस्कृति केवल फिल्मों पर निर्भर नहीं है। त्योहार घरों, समुदायों, मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों पर जीवित रहेंगे। लेकिन जब सिनेमा सांस्कृतिक कहानियां सुनाना बंद कर देता है, तो सांस्कृतिक स्मृति का एक महत्वपूर्ण माध्यम कमजोर जरूर हो जाता है।
इसका समाधान यह नहीं है कि हर फिल्म में जबरन कोई त्योहार का दृश्य शामिल किया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि फिल्मकार भारत की सांस्कृतिक विविधता की समृद्धि को समझें और जब कहानी इसकी मांग करे, तब उसका संवेदनशील और सार्थक उपयोग करें।
सिनेमा का भविष्य आधुनिकता और परंपरा के बीच चुनाव का विषय नहीं होना चाहिए। दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। तकनीकी रूप से विकसित और वैश्विक रूप से जुड़ा समाज भी पारिवारिक मेल-मिलाप, लोक परंपराओं, स्थानीय भाषाओं, पारंपरिक संगीत और सामुदायिक उत्सवों को महत्व दे सकता है।
वास्तव में श्रेष्ठ सिनेमा अक्सर तब जन्म लेता है जब पुराना और नया एक-दूसरे से संवाद करते हैं।
त्योहार बदलते परिवारों, प्रवास, पीढ़ियों के अंतर, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समानता, सामुदायिक सद्भाव और मानवीय रिश्तों पर प्रभावशाली कहानियां दे सकते हैं। वे केवल रंगीन पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि समाज की कहानी के महत्वपूर्ण पात्र बन सकते हैं।
सिनेमा समय के साथ बदलता है, क्योंकि समाज समय के साथ बदलता है। लेकिन बदलते सिनेमाई परिदृश्य में हमारे त्योहार किसी भूली हुई सांस्कृतिक विरासत की केवल सजावटी स्मृतियां बनकर न रह जाएं।
वे हमारी पहचान की जीवंत अभिव्यक्ति बने रहें—यह जिम्मेदारी केवल परिवार और समाज की नहीं, बल्कि सिनेमा की भी है।
सिनेमा आगे बढ़े, लेकिन संस्कृति को पीछे छोड़कर नहीं। त्योहार समय के साथ बदलें, लेकिन अपनी आत्मा न खोएं। चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि जैसे-जैसे पर्दा आधुनिक होता जाए, उस पर दिखाई देने वाली हमारी सांस्कृतिक स्मृतियां चुपचाप गायब न हों।
डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्राचार्य | शैक्षिक स्तंभकार | प्रख्यात गणितज्ञ | अकादमिक संपादक, FnBworld.com
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