शरद कटियार
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा कक्षा 11वीं और 12वीं की राजनीति विज्ञान की पुस्तकों के लिए पाठ्यपुस्तक विकास दल का पुनर्गठन शिक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। नई पुस्तकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा-विद्यालयी शिक्षा 2023 के अनुरूप तैयार करने की तैयारी है। यह बदलाव केवल किताबों के अध्याय बदलने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका वास्तविक उद्देश्य विद्यार्थियों में लोकतांत्रिक समझ, तार्किक क्षमता और सवाल पूछने की प्रवृत्ति विकसित करना होना चाहिए।
राजनीति विज्ञान ऐसा विषय है जो सीधे लोकतंत्र, संविधान, संसद, न्यायपालिका, अधिकारों, कर्तव्यों और शासन व्यवस्था से जुड़ा है। इसलिए इसकी पाठ्यपुस्तक तैयार करना सामान्य विषयों की किताब तैयार करने जैसा काम नहीं है। यहां तथ्य और निष्पक्षता सबसे महत्वपूर्ण हैं। किताब में सरकारों और राजनीतिक दलों का उल्लेख हो सकता है, लेकिन किसी विचारधारा का प्रचार नहीं होना चाहिए।
नई शिक्षा नीति में विद्यार्थियों को रटने के बजाय समझने, विश्लेषण करने और तर्क करने की क्षमता विकसित करने पर जोर दिया गया है। राजनीति विज्ञान की नई पुस्तकों में इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देना चाहिए। विद्यार्थियों को केवल यह नहीं बताया जाना चाहिए कि संविधान क्या कहता है, बल्कि यह भी समझाया जाना चाहिए कि संवैधानिक संस्थाएं व्यवहार में कैसे काम करती हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां हैं और नागरिक अपनी भूमिका किस तरह निभा सकते हैं।
सबसे बड़ी चुनौती पाठ्यक्रम में संतुलन बनाए रखने की है। भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में राजनीति को एक ही नजरिये से नहीं समझाया जा सकता। अलग-अलग राजनीतिक विचार, सामाजिक आंदोलनों, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और ऐतिहासिक घटनाओं को तथ्यात्मक संदर्भ के साथ स्थान मिलना चाहिए। विद्यार्थियों को निष्कर्ष थमाने के बजाय उन्हें तथ्य देकर स्वयं निष्कर्ष निकालने का अवसर दिया जाना चाहिए।
नई किताबों में डिजिटल युग की राजनीति को भी पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए। सामाजिक मीडिया, गलत सूचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, चुनावी प्रचार, राजनीतिक संचार और नागरिकों की डिजिटल भागीदारी आज लोकतंत्र के महत्वपूर्ण हिस्से बन चुके हैं। आने वाली पीढ़ी इन विषयों से प्रतिदिन रूबरू होती है। ऐसे में राजनीति विज्ञान की किताब यदि केवल पारंपरिक संस्थाओं तक सीमित रही तो वह विद्यार्थियों की वास्तविक दुनिया से पीछे छूट जाएगी।
पाठ्यपुस्तकों के पुनर्गठन के साथ यह भी जरूरी है कि लेखन प्रक्रिया में विभिन्न क्षेत्रों, विचारधाराओं और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के विशेषज्ञों की भागीदारी हो। पुस्तक जितनी व्यापक विशेषज्ञता और तथ्यात्मक स्रोतों के आधार पर तैयार होगी, उसकी विश्वसनीयता उतनी ही मजबूत होगी।
नई किताबों का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा कराना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो संविधान को समझें, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल कर सकें, अपने अधिकारों और कर्तव्यों से परिचित हों तथा असहमति का सम्मान करना सीखें।
राजनीति विज्ञान की किताब बदलना आसान है, लेकिन लोकतांत्रिक सोच को मजबूत करने वाली किताब लिखना बड़ी जिम्मेदारी है। एनसीईआरटी के सामने यही असली परीक्षा है। नई पाठ्यपुस्तकें नई शिक्षा नीति के अनुरूप हों, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान तथ्य, तर्क, निष्पक्षता और विचारों की विविधता होनी चाहिए। यही शिक्षा को वास्तव में लोकतंत्र की आधारशिला बना सकता है।
राजनीति विज्ञान की किताबें बदलें, लेकिन इतिहास और विचारों की विविधता न बदले


