प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोप पत्र या अंतिम रिपोर्ट दाखिल होने के बाद आगे की विवेचना को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद विवेचक अपनी मर्जी से आगे की जांच शुरू नहीं कर सकता। इसके लिए सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष औपचारिक प्रार्थना पत्र देकर पूर्व अनुमति लेना आवश्यक होगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि आगे की विवेचना का आदेश देने का अधिकार न्यायालय के विवेकाधिकार में है। विवेचक को अदालत के सामने यह बताना होगा कि मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए नए साक्ष्यों की जांच आवश्यक है। हालांकि, आगे की विवेचना और नए सिरे से जांच में अंतर रहेगा। पुलिस को केवल आगे की विवेचना का अधिकार है, जबकि पूरी तरह नए सिरे से जांच का अधिकार असाधारण परिस्थितियों में संवैधानिक अदालतों को ही है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मजिस्ट्रेट पहले ही अंतिम रिपोर्ट स्वीकार कर चुका हो, तब भी नए साक्ष्य सामने आने पर आगे की विवेचना की जा सकती है। इसके लिए पुराने आदेश को रद्द कराने की जरूरत नहीं होगी। साथ ही, आगे की विवेचना शुरू करने से पहले अभियुक्त को सूचना देना या उसकी सहमति लेना अनिवार्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने विवेचना में निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने पर जोर देते हुए स्पष्ट किया कि आगे की जांच का उद्देश्य नए तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर मामले की वास्तविकता सामने लाना होना चाहिए।


