शरद कटियार
उत्तर प्रदेश में मानसून के बीच शारदा और घाघरा समेत कई नदियों का जलस्तर बढ़ना यह संकेत दे रहा है कि आने वाले दिनों में बाढ़ की चुनौती को हल्के में नहीं लिया जा सकता। राहत आयुक्त कार्यालय की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के 12 जिले और 166 गांव बाढ़ से प्रभावित हैं तथा करीब 64,402 लोग इसकी चपेट में आए हैं। सरकार ने इससे निपटने के लिए जिस बड़े पैमाने पर राहत और बचाव तंत्र को सक्रिय किया है, वह निश्चित रूप से प्रशासनिक तैयारी का मजबूत उदाहरण है। लेकिन किसी भी आपदा प्रबंधन की असली परीक्षा केवल टीमों की संख्या या संसाधनों की उपलब्धता से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि संकट की घड़ी में मदद कितनी तेजी और प्रभावी ढंग से जरूरतमंद तक पहुंचती है।
प्रदेश में 1,586 बाढ़ चौकियां और 1,263 शरणालय तैयार किए जाना बताता है कि प्रशासन ने संभावित खतरे को देखते हुए पहले से व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश की है। एनडीआरएफ की 18, एसडीआरएफ की 16 और पीएसी की 52 टीमें यानी कुल 86 टीमें राहत-बचाव कार्य में लगाई गई हैं। इसके अलावा 5,849 नावों और 1,101 मोटरबोट की उपलब्धता भी व्यापक संसाधन क्षमता को दर्शाती है। ऐसे समय में इन संसाधनों का सही स्थान पर, सही समय पर और प्रशिक्षित कर्मचारियों के साथ उपयोग होना सबसे महत्वपूर्ण है।
बाढ़ केवल पानी बढ़ने का संकट नहीं है। इसके साथ बीमारी, पेयजल की समस्या, खाद्य सामग्री की कमी, बिजली और संचार व्यवस्था बाधित होने तथा पशुधन की सुरक्षा जैसी अनेक चुनौतियां एक साथ सामने आती हैं। इस लिहाज से 69 मेडिकल टीमों और 51 एंबुलेंस की तैनाती महत्वपूर्ण है। ओआरएस और क्लोरीन की गोलियों का वितरण भी जरूरी कदम है, क्योंकि बाढ़ उतरने के बाद दूषित पानी से फैलने वाली बीमारियों का खतरा और बढ़ जाता है। प्रशासन को अभी से इस चरण की तैयारी भी समान गंभीरता से करनी होगी।
राहत व्यवस्था में भोजन की उपलब्धता भी अहम है। अब तक 15,133 खाद्यान्न पैकेट और 24,266 लंच पैकेट वितरित किए जा चुके हैं। 308 राहत वितरण केंद्र बनाए गए हैं। आंकड़े बताते हैं कि सरकार ने राहत सामग्री पहुंचाने का ढांचा तैयार किया है, लेकिन प्रभावित परिवारों की वास्तविक जरूरतों का लगातार आकलन करना भी जरूरी है। बाढ़ की स्थिति एक समान नहीं होती। कहीं गांव पूरी तरह जलमग्न होते हैं तो कहीं संपर्क मार्ग कट जाता है। इसलिए एक जैसी राहत व्यवस्था के बजाय क्षेत्रवार जरूरत के अनुसार रणनीति बनाई जानी चाहिए।
सबसे अधिक चिंता शारदा और घाघरा नदी के खतरे के निशान से ऊपर बहने को लेकर है। लखीमपुर खीरी के पलियाकलां में शारदा और बाराबंकी के एल्गिनब्रिज के पास घाघरा का जलस्तर निगरानी की मांग करता है। नदी के जलस्तर में छोटे बदलाव भी निचले इलाकों में बड़ी समस्या पैदा कर सकते हैं। ऐसे में तटवर्ती गांवों में प्रशासन की मौजूदगी केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। स्थानीय स्तर पर लगातार सूचना देने, लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने और जरूरत पड़ने पर तत्काल निकासी की व्यवस्था तैयार रहनी चाहिए।
बारिश के आंकड़े भी मौसम की बदलती तस्वीर सामने रखते हैं। एक जून से 16 अगस्त तक प्रदेश में 381 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई, जबकि सामान्य बारिश 488.9 मिलीमीटर होनी चाहिए थी। यानी पूरे प्रदेश में औसत रूप से बारिश सामान्य से कम रही है। इसके बावजूद कुछ जिलों में अत्यधिक बारिश और नदियों के जलस्तर में वृद्धि ने बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी है। इससे साफ है कि केवल प्रदेश के औसत वर्षा आंकड़ों से खतरे का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। स्थानीय स्तर पर हुई भारी बारिश, बैराजों से छोड़ा गया पानी और नदियों के जलस्तर को लगातार जोड़कर देखना होगा।
पिछले 24 घंटे में लखीमपुर खीरी में 92.5 मिलीमीटर बारिश दर्ज होना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। बहराइच, शाहजहांपुर, संभल, चित्रकूट और लखनऊ समेत कई जिलों में भी अच्छी बारिश हुई। दूसरी ओर फर्रुखाबाद में 25.5 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। मानसून की यह असमानता प्रशासन के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रणनीति अपनाने की आवश्यकता बताती है।
संचयी बारिश के आंकड़े भी दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं। संभल, मेरठ और मुजफ्फरनगर जैसे जिलों में सामान्य से काफी अधिक बारिश हुई है, जबकि कई जिलों में बारिश सामान्य से काफी कम रही। फर्रुखाबाद में भी सामान्य की तुलना में बारिश का स्तर काफी कम बताया गया है। ऐसे में जहां कम बारिश वाले क्षेत्रों में जलसंकट और कृषि संबंधी चुनौतियां सामने आ सकती हैं, वहीं नदी किनारे के इलाकों में कम कुल बारिश के बावजूद अचानक बाढ़ का खतरा बना रह सकता है।
बाढ़ प्रबंधन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका स्थानीय प्रशासन और ग्रामीणों के बीच बेहतर संवाद की है। बाढ़ चौकियों पर तैनात कर्मचारियों को केवल निगरानी तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उन्हें स्थानीय परिवारों, बुजुर्गों, बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बीमार लोगों की जानकारी भी रखनी चाहिए, ताकि आवश्यकता पड़ने पर प्राथमिकता के आधार पर सुरक्षित निकासी की जा सके। नावों और मोटरबोट का संचालन प्रशिक्षित लोगों के हाथों में होना चाहिए और रात के समय बचाव कार्यों के लिए पर्याप्त रोशनी तथा संचार साधन उपलब्ध रहने चाहिए।
पशुधन की सुरक्षा भी राहत अभियान का अहम हिस्सा है। रिपोर्ट के अनुसार 3,502 पशु प्रभावित हुए हैं और उनके लिए 154 क्विंटल भूसा वितरित किया गया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुधन परिवारों की बड़ी पूंजी होता है। इसलिए बाढ़ के दौरान इंसानों के साथ पशुओं के लिए भी सुरक्षित स्थान, चारा और उपचार की व्यवस्था आवश्यक है।
बाढ़ से 69 मकानों के क्षतिग्रस्त होने की सूचना है और फिलहाल किसी जनहानि या पशुहानि की सूचना नहीं है।
यह राहत की बात है। लेकिन प्रशासन को नुकसान का आकलन जल्द और पारदर्शी तरीके से करना होगा। बाढ़ का पानी उतरने के बाद असली चुनौती शुरू होती है—क्षतिग्रस्त मकानों की मरम्मत, सड़क और बिजली व्यवस्था की बहाली, खेतों में जमा मलबा हटाना, पेयजल की शुद्धता सुनिश्चित करना और प्रभावित परिवारों को दोबारा सामान्य जीवन में लौटाना।
योगी सरकार ने राहत, बचाव और पुनर्वास के लिए व्यापक व्यवस्था जरूर खड़ी की है, लेकिन अब जरूरत इस व्यवस्था की लगातार निगरानी की है। आपदा के समय सरकारी मशीनरी की सफलता का पैमाना यह होना चाहिए कि सबसे दूर और सबसे ज्यादा प्रभावित परिवार तक मदद कितनी जल्दी पहुंची। केवल आंकड़ों में बड़ी संख्या में टीमें, नावें और राहत केंद्र होना पर्याप्त नहीं है। इनका जमीनी उपयोग ही व्यवस्था की वास्तविक मजबूती साबित करेगा।
बाढ़ प्रकृति की चुनौती है, लेकिन उससे होने वाला नुकसान काफी हद तक हमारी तैयारी पर निर्भर करता है। इसलिए सरकार को तत्काल राहत के साथ दीर्घकालीन बाढ़ प्रबंधन पर भी ध्यान देना होगा। नदियों के तटबंधों की नियमित जांच, जलनिकासी व्यवस्था की मजबूती, संवेदनशील गांवों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, सुरक्षित ऊंचे स्थानों की पहचान और समय पर चेतावनी प्रणाली को और मजबूत करना जरूरी है।
आज जरूरत केवल बाढ़ से लोगों को बचाने की नहीं, बल्कि उन्हें यह भरोसा देने की है कि संकट के दौरान सरकार उनके साथ खड़ी है। राहत की हर नाव, हर मेडिकल टीम और हर भोजन का पैकेट तभी सार्थक होगा, जब वह सही समय पर सही व्यक्ति तक पहुंचे। सरकार की तैयारी मजबूत दिखाई दे रही है; अब उसकी सबसे बड़ी परीक्षा जमीनी क्रियान्वयन, सतत निगरानी और बाढ़ उतरने के बाद प्रभावित परिवारों के पुनर्वास में होगी।


