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Sunday, August 16, 2026

वन्देमातरम का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान

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 अशोक भाटिया , वसई

‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वतंत्रता संग्राम की सामूहिक आत्मा का जीवंत प्रतीक है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के कलम से निकले इन दो शब्दों ने पराधीन भारत में वह राष्ट्रभक्ति की अग्नि प्रज्वलित की थी, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। आज जब देश अपनी स्वतंत्रता के अमृत काल से आगे बढ़ते हुए एक सशक्त वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है, तब “वंदे मातरम् का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान” का नारा केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि देश के 140 करोड़ नागरिकों के स्वाभिमान की हुंकार है। हाल के दिनों में राष्ट्रगीत को लेकर देश के भीतर जो वैधानिक और राजनीतिक विमर्श खड़ा हुआ है, उसने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि राष्ट्र के मूल प्रतीकों के प्रति हमारी निष्ठा राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर क्यों नहीं हो पा रही है। विशेषकर, देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी, कांग्रेस का इस पूरे घटनाक्रम में जो रुख रहा है, वह बौद्धिक और वैधानिक विमर्श के केंद्र में आ गया है।

यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो वंदे मातरम् और कांग्रेस का संबंध बहुत पुराना और गहरा दिखाई देता है। सन 1896 के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वयं इस गीत को गाकर कांग्रेस के मंच से राष्ट्रीय ऊर्जा का संचार किया था। इसके बाद 1901, 1905 और स्वतंत्रता आंदोलन के लगभग हर बड़े मंच पर कांग्रेस के नेताओं ने वंदे मातरम् के नारों के साथ लाठियां खाईं और जेलें भरीं। उस दौर की कांग्रेस के लिए यह गीत भारत माता की वंदना का एक पवित्र मंत्र था।

परंतु, जैसे-जैसे स्वतंत्रता आंदोलन आगे बढ़ा और देश विभाजन की विभीषिका की ओर अग्रसर हुआ, कांग्रेस के भीतर एक वैचारिक भटकाव देखा जाने लगा। मुस्लिम लीग के तुष्टीकरण और विरोध के सामने झुकते हुए, कांग्रेस ने इस गीत के पूर्ण गायन पर संकोच जताना शुरू कर दिया। 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने एक प्रस्ताव पारित कर इसके केवल शुरुआती दो छंदों को ही गाने की अनुमति दी, क्योंकि इसके बाद के छंदों में भारत भूमि को दुर्गा और लक्ष्मी के रूप में चित्रित किया गया था, जिस पर कुछ समुदायों को आपत्ति थी। यह इतिहास का वह पहला मोड़ था जहाँ कांग्रेस ने राष्ट्रीय अस्मिता के इस महामंत्र को राजनीतिक चश्मे से देखना शुरू किया। यहीं से राष्ट्र के सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ समझौता करने की जो परिपाटी शुरू हुई, उसका खामियाजा देश आज तक भुगत रहा है।

आजादी मिलने के बाद जब संविधान सभा में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के चयन का प्रश्न आया, तब भी कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व का रवैया वंदे मातरम् के प्रति पूर्ण न्यायसंगत नहीं रहा। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट रूप से घोषणा की थी कि वंदे मातरम् को जन-गण-मन के समान ही दर्जा और सम्मान प्राप्त होगा। लेकिन व्यावहारिक धरातल पर कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में वंदे मातरम् को वह स्थान नहीं मिल सका, जो जन-गण-मन को मिला।दशकों तक कांग्रेस ने वंदे मातरम् को केवल एक औपचारिक औपचारिकता तक सीमित रखा। सरकारी विद्यालयों, दूरदर्शन या आकाशवाणी पर इसके प्रसारण को लेकर कांग्रेस सरकारों की नीतियां हमेशा रक्षात्मक रहीं। इसका कारण यह था कि कांग्रेस को हमेशा यह भय सताता रहा कि यदि वे वंदे मातरम् को अधिक बढ़ावा देंगे, तो उनका एक खास वोट बैंक उनसे छिटक सकता है। इस राजनीतिक कायरता और तुष्टीकरण की नीति ने राष्ट्रगीत के महत्व को कमतर करने का काम किया। कांग्रेस ने बार-बार राष्ट्रगीत के सम्मान को अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के नीचे दबाए रखा।

वर्ष 2026 भारत के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ है, जब संसद ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम में संशोधन कर ‘वंदे मातरम’ को कानूनी रूप से राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ के ठीक बराबर का दर्जा दे दिया। अब राष्ट्रगीत का अपमान करना भी उसी श्रेणी का दंडनीय अपराध बन गया है, जो राष्ट्रगान के अपमान पर होता है। इसके साथ ही सरकारी कार्यक्रमों में इसके सभी छह छंदों के गायन को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।

इस ऐतिहासिक और स्वागत योग्य कदम पर भी कांग्रेस पार्टी ने जिस प्रकार की आपत्तियां तथा प्रतिक्रियाएं दर्ज कराईं, उसने देश को हैरान कर दिया। कांग्रेस के कई शीर्ष नेताओं ने इसे “सांस्कृतिक थोपने की नीति” और “विभाजनकारी एजेंडा” करार दिया। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के आयोजनों के दौरान जब वंदे मातरम् का पूर्ण गायन किया गया, तो कांग्रेस शासित राज्यों या कांग्रेस के मंचों पर इसके प्रति उदासीनता और कई जगहों पर तो विरोध के स्वर देखे गए। कांग्रेस का यह तर्क कि “किसी पर देशभक्ति थोपी नहीं जा सकती”, वास्तव में राष्ट्रगीत के प्रति उनकी ऐतिहासिक अरुचि और वर्तमान राजनीतिक हताशा को दर्शाता है। जब देश का कानून और सर्वोच्च न्यायालय यह मान चुका है कि राष्ट्रगीत का सम्मान प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है, तब कांग्रेस द्वारा इस पर राजनीति करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

इस वैधानिक बदलाव के तुरंत बाद, शानिवार यानी 15 अगस्त 2026 को देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कांग्रेस मुख्यालय (इंदिरा भवन) में एक नया विवाद सामने आया। ध्वजारोहण समारोह के दौरान जब वंदे मातरम् का पूर्ण संस्करण बजाया जा रहा था, तब भाजपा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने इसे बीच में ही रोकने का इशारा किया, जिसे भाजपा प्रवक्ताओं और दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने राष्ट्रगीत का घोर अपमान और नए कानून का उल्लंघन बताते हुए माफी की मांग की। इसके विपरीत, कांग्रेस ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि मुख्यालय में राष्ट्रगीत का पूरा संस्करण गाया गया था और वहां हुआ इशारा केवल पार्टी अध्यक्ष के बैठने के लिए कुर्सी मंगाने को लेकर था। जयराम रमेश जैसे नेताओं ने ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देकर विवाद को टालने का प्रयास किया, लेकिन इस घटना ने संपादकीय विमर्श में कांग्रेस की राष्ट्रगीत के प्रति प्रतिबद्धता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

वंदे मातरम् का विरोध या उसके प्रति उदासीनता वास्तव में भारत की मूल पहचान और उसकी सनातन संस्कृति के प्रति एक संकीर्ण दृष्टिकोण का परिणाम है। कांग्रेस ने स्वतंत्रता के बाद से ही देश के विमर्श को इस प्रकार मोड़ने का प्रयास किया कि बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां “सांप्रदायिक” लगने लगें और राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान दिखाना किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा का हिस्सा मान लिया जाए।
कांग्रेस द्वारा बार-बार वंदे मातरम् के मुद्दे पर रक्षात्मक होना या उसका परोक्ष विरोध करना यह साबित करता है कि पार्टी आज भी उसी 1937 वाली मानसिकता से ग्रसित है। आज का हिंदुस्तान बदल चुका है; यह वह भारत है जो अपनी जड़ों पर गर्व करता है। जब सेना के जवान सीमाओं पर ‘वंदे मातरम्’ के उद्घोष के साथ अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं, जब अंतरिक्ष में तिरंगा फहराते समय वैज्ञानिक इस मंत्र को याद करते हैं, तब देश की संसद में बैठी कांग्रेस पार्टी का इसके वैधानिक दर्जे पर सवाल उठाना देश की जनता को स्वीकार्य नहीं है। हिंदुस्तान अब यह भली-भांति समझ चुका है कि कौन राष्ट्र के प्रतीकों के साथ खड़ा है और कौन राजनीतिक स्वार्थ के लिए उनके महत्व को धूमिल कर रहा है।

भारत वर्तमान में एक अभूतपूर्व सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा है। अयोध्या में प्रभु श्री राम के भव्य मंदिर के निर्माण से लेकर काशी, उज्जैन के कायाकल्प और अब वंदे मातरम् को उसका वास्तविक वैधानिक अधिकार मिलने तक, देश अपनी खोई हुई सांस्कृतिक चेतना को पुनः प्राप्त कर रहा है। इस पुनर्जागरण में राष्ट्रगीत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश की भौगोलिक और आध्यात्मिक एकता को जोड़ता है।
“वंदे मातरम् का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान” केवल एक नारा नहीं है, बल्कि यह उन सभी राजनीतिक शक्तियों के लिए चेतावनी है जो राष्ट्र के आत्मगौरव को कमजोर करना चाहती हैं। कांग्रेस को यह समझना होगा कि राष्ट्र के प्रतीक किसी दल, सरकार या विचारधारा की बपौती नहीं होते। वे पूरे राष्ट्र के होते हैं। यदि कांग्रेस आज भी तुष्टीकरण की राजनीति के चक्रव्यूह से बाहर निकलकर वंदे मातरम् को पूरे मन से स्वीकार नहीं कर पाती है, तो वह देश की मुख्यधारा के जनमानस से और अधिक दूर होती चली जाएगी। जनता अब राष्ट्र के अपमान और राष्ट्रीय गीतों पर की जाने वाली ओछी राजनीति को पूरी तरह खारिज करने के लिए संकल्पबद्ध हो चुकी है।

यह स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है कि वंदे मातरम् का सम्मान किसी कानूनी मजबूरी से कहीं अधिक हमारी आंतरिक राष्ट्रभक्ति का विषय होना चाहिए। संसद द्वारा बनाया गया नया कानून उन लोगों के लिए एक कड़ा सबक है जो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर राष्ट्र के प्रतीकों को लांछित करते थे। कांग्रेस सहित देश के सभी राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सत्ता आती-जाती रहती है, सरकारें बदलती रहती हैं, परंतु राष्ट्र और राष्ट्र के प्रतीक शाश्वत रहते हैं।

हिंदुस्तान ने यह संदेश साफ तौर पर दे दिया है कि माँ भारती की वंदना में गाए जाने वाले इस पावन गीत का अपमान अब किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। चाहे वह संसद के भीतर की राजनीति हो या सड़कों पर होने वाला छद्म विमर्श, वंदे मातरम् की गूंज हर भारतीय के दिल में धड़कती रहेगी। अब समय आ गया है कि दलीय सीमाओं और वोट बैंक की चिंताओं से ऊपर उठकर, पूरा देश एक स्वर में कहे—वंदे मातरम्! क्योंकि इसी उद्घोष में भारत का अतीत, वर्तमान और गौरवशाली भविष्य समाहित है।

अशोक भाटिया,
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार ,लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
वसई पूर्व – 401208 ( मुंबई )E MAIL – vasairoad.yatrisangh@gmail.com व्हाट्स एप्प 9221232130

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