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Friday, August 14, 2026

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष- अमर शहीद महेंद्र गोप,जिसकी घुड़सवारी की गूंज से भी कांपते थे अंग्रेज

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(डॉ.रविशंकर कुमार चौधरी-विभूति फीचर्स)

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल उन बड़े नेताओं का इतिहास नहीं है, जिनके नाम देश की स्मृति में स्थायी रूप से दर्ज हैं। इस इतिहास की एक बड़ी धारा उन स्थानीय और क्षेत्रीय क्रांतिकारियों के बलिदान से बनी, जिन्होंने अपने गांव, कस्बे और इलाके को संघर्ष की जमीन बनाया। अंगभूमि भी ऐसे अनेक वीरों की साक्षी रही है। इन्हीं में एक नाम है अमर शहीद महेंद्र गोप का, जिनकी क्रांतिकारी गतिविधियों ने ब्रिटिश हुकूमत को लंबे समय तक परेशान किए रखा।
आजादी की लड़ाई केवल अहिंसक आंदोलनों तक सीमित नहीं थी। इसके समानांतर एक ऐसी उग्र क्रांतिकारी धारा भी सक्रिय थी, जो औपनिवेशिक सत्ता को हथियारबंद प्रतिरोध के जरिए चुनौती दे रही थी। महेंद्र गोप इसी धारा के प्रमुख चेहरों में थे।
आज विडंबना यह है कि जिस क्रांतिकारी के नाम से कभी अंग्रेजी शासन भयभीत था, उनकी स्मृति आज मुख्यतः बांका जिले के अमरपुर प्रखंड के भरको पंचायत अंतर्गत रामपुर गांव के एक स्मारक तक सिमटकर रह गई है। सरकारी स्तर पर उनकी स्मृति को वह स्थान नहीं मिल सका, जिसके वे हकदार थे। चांदन नदी पर बने एक पुल का नाम उनके नाम पर रखा गया, लेकिन वह नाम भी जनस्मृति में अपेक्षित रूप से स्थापित नहीं हो सका।
सवाल तो यह भी है कि क्या किसी शहीद की स्मृति को केवल एक गांव के स्मारक तक सीमित कर देना पर्याप्त है?
महेंद्र गोप रामपुर के एक अहीर परिवार में जन्मे थे। उनका जन्म 15 अगस्त 1912 को हुआ था। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े इस युवक के भीतर कम उम्र में ही अंग्रेजी शासन के प्रति आक्रोश पैदा हो गया था। एक प्रसंग के अनुसार, जब वे अमरपुर की ओर जा रहे थे, तब रास्ते में कुछ ब्रिटिश अधिकारियों और सैनिकों ने उन्हें रोक लिया और सलाम करने को कहा। बात न समझ पाने पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया और उन्हें पीटा गया। कम उम्र के कारण उन्हें छोड़ दिया गया, लेकिन उस घटना ने उनके मन में अंग्रेजी शासन के प्रति विद्रोह की चिंगारी पैदा कर दी।
इसके बाद महेंद्र गोप का संपर्क क्रांतिकारियों से हुआ। उनका विश्वास शांतिपूर्ण प्रतिरोध की अपेक्षा सशस्त्र संघर्ष में अधिक था। उन्होंने अपने जैसे युवाओं को संगठित किया और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अभियान चलाने लगे। घोड़े की सवारी में दक्ष महेंद्र गोप के बारे में स्थानीय स्मृतियों में अनेक प्रसंग मिलते हैं। कहा जाता है कि जब वे अपने साथियों के साथ घोड़े पर सवार होकर निकलते थे तो उनके घोड़े की टाप की आवाज ही अंग्रेजी अधिकारियों के लिए खतरे का संकेत बन जाती थी।
भागलपुर क्षेत्र में उस समय कई क्रांतिकारी दल सक्रिय थे। श्री परशुराम सिंह के नेतृत्व में बने परशुराम दल में महेंद्र गोप की भूमिका महत्वपूर्ण रही। धीरे-धीरे वे इस दल के प्रभावशाली नेताओं में उभरे। उनकी ताकत केवल व्यक्तिगत साहस में नहीं थी, बल्कि अपने आसपास के युवाओं को संगठित करने की क्षमता में भी थी।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दक्षिण भागलपुर का इलाका अंग्रेजी शासन के खिलाफ गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। महेंद्र गोप और परशुराम सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश प्रशासन को खुली चुनौती दी। सरकारी प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचाने और अंग्रेजी शासन के समर्थकों के विरुद्ध कार्रवाई जैसी घटनाओं ने प्रशासन को परेशान कर दिया था।
महेंद्र गोप के साथ कई स्थानीय युवा जुड़े। लाखो शाही, जागो शाही, श्री गोप, श्रीधर, प्रद्युम्न और दयानाथ जैसे नाम उनके साथियों में बताए जाते हैं। बाद के दौर में परिस्थितियां बदलीं और महेंद्र गोप का अपना स्वतंत्र समूह अधिक सक्रिय हुआ। महेंद्र गोप और उनके साथियों के संबंध कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से भी रहे। मई 1943 में उनका समूह सियाराम सिंह के संगठन से जुड़ा, लेकिन कुछ ही समय बाद उन्हें उससे अलग कर दिया गया। इसके बाद महेंद्र गोप ने अपने तरीके से क्रांतिकारी गतिविधियां जारी रखीं।
उनका संघर्ष केवल किसी एक घटना या एक संगठन तक सीमित नहीं था। वे दक्षिण भागलपुर, विशेषकर बांका क्षेत्र के जंगलों में अपने साथियों के साथ सक्रिय रहते थे। जंगल उनके लिए सुरक्षित ठिकाना भी था और संघर्ष की रणनीति बनाने का स्थान भी। ब्रिटिश पुलिस लंबे समय से उनकी तलाश में थी। अंततः सितंबर 1944 के अंतिम दिनों में पुलिस ने बांका उपखंड के जंगलों में अभियान चलाकर महेंद्र गोप और उनके कई साथियों को गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी अंग्रेजी प्रशासन के लिए बड़ी सफलता मानी गई, क्योंकि लंबे समय से महेंद्र गोप उसके लिए चुनौती बने हुए थे।
गिरफ्तारी के बाद उनके विरुद्ध गंभीर मुकदमा चलाया गया। उन पर अंग्रेज अधिकारियों और उनके समर्थकों की हत्या तथा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे आरोप लगाए गए। औपनिवेशिक अदालत ने उन्हें मृत्युदंड सुनाया।
महेंद्र गोप को बचाने के लिए राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े नेताओं ने भी प्रयास किए। डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं द्वारा उनकी सजा कम कराने की कोशिशों का उल्लेख मिलता है, लेकिन अंग्रेजी शासन ने उनकी दया याचिका स्वीकार नहीं की और फिर वह दिन आया, जब अंग्रेजी शासन ने अपने सबसे बड़े विरोधियों में से एक को फांसी दे दी।
23 नवंबर 1945 को भागलपुर कैंप जेल में महेंद्र गोप को फांसी दे दी गई। उनकी उम्र उस समय लगभग 33 वर्ष थी। जिस सत्ता ने उन्हें खत्म कर देने की कोशिश की, वह उनके शरीर को तो समाप्त कर सकी, लेकिन उनके साहस और संघर्ष की स्मृति को नहीं मिटा सकी।
महेंद्र गोप की कहानी में कई ऐसे प्रसंग हैं जिन्हें इतिहास के गंभीर अध्ययन और दस्तावेजी शोध की जरूरत है। क्रांतिकारी गतिविधियों की प्रकृति, उनके विभिन्न संगठनों से संबंध, ब्रिटिश प्रशासन के अभिलेख और उनके मुकदमे से जुड़े दस्तावेज यदि व्यवस्थित रूप से सामने लाए जाएं, तो अंग क्षेत्र के स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण अध्याय और स्पष्ट हो सकता है। यही कारण है कि महेंद्र गोप की स्मृति को केवल श्रद्धांजलि समारोहों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। रामपुर का स्मारक महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे आगे भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
बांका जिला मुख्यालय में उनके नाम पर कोई महत्वपूर्ण स्मृति-स्थल, संग्रहालय या शोध-केंद्र विकसित किया जा सकता है। उनके जीवन से जुड़े दस्तावेज, तस्वीरें, न्यायिक अभिलेख, स्थानीय मौखिक इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित सामग्री एकत्र की जा सकती है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में उनके जीवन पर व्याख्यान, निबंध और शोध प्रतियोगिताएं आयोजित की जा सकती हैं। इन सबसे भी ज्यादा जरूरी है कि अंगभूमि के बच्चे अपने क्षेत्र के इस वीर सपूत को जानें।
भागलपुर और बांका की धरती ने स्वतंत्रता आंदोलन में अनेक सेनानियों को जन्म दिया। लेकिन स्थानीय इतिहास की विडंबना यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित नामों के पीछे अनेक क्षेत्रीय नायक धीरे-धीरे विस्मृति में चले जाते हैं। महेंद्र गोप भी इसी विस्मृति का शिकार हुए हैं।
आज जब हम स्वतंत्रता संग्राम की विरासत को याद करते हैं, तो हमें यह भी पूछना चाहिए कि हमने अपने स्थानीय शहीदों के साथ कितना न्याय किया है?
किसी शहीद की प्रतिमा लगा देना या किसी पुल का नाम उसके नाम पर रख देना स्मृति संरक्षण की शुरुआत हो सकती है, उसका अंत नहीं।
आज जरूरत है कि रामपुर के उस स्मारक से निकलकर महेंद्र गोप की कहानी बांका, भागलपुर और पूरे अंगप्रदेश की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बने। उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि से जुड़ी घटनाओं का दस्तावेजीकरण हो। उनके संघर्ष को इतिहास की प्रमाणित सामग्री के साथ नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
महेंद्र गोप केवल एक गांव के शहीद नहीं थे। वे उस दौर के प्रतिनिधि थे, जब भारत का एक युवा वर्ग गुलामी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। उनके संघर्ष की पद्धति पर इतिहासकारों के बीच बहस हो सकती है, लेकिन देश की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने जो कीमत चुकाई, उसे विस्मृत नहीं किया जा सकता।
23 नवंबर 1945 को भागलपुर की जेल में फांसी का फंदा उनके जीवन का अंत था, लेकिन उनकी कहानी का नहीं। अब जिम्मेदारी हमारी है कि उस कहानी को स्मारक की चारदीवारी से बाहर निकालें और महेंद्र गोप की कुर्बानी को केवल याद न करें उसे इतिहास में उसका उचित स्थान भी दें। (लेखक तेज नारायण बनैली महाविद्यालय, भागलपुर में इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष हैं) (विभूति फीचर्स)

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