संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है। यहां देश के करोड़ों नागरिकों की आवाज पहुंचती है, नीतियों पर बहस होती है, सरकार से सवाल पूछे जाते हैं और जनता के भविष्य से जुड़े फैसले लिए जाते हैं। ऐसे में मानसून सत्र के अंतिम दिन लोकसभा की कार्यवाही का महज करीब एक मिनट चलना और वंदे मातरम् के बाद सदन का अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो जाना केवल एक राजनीतिक घटनाक्रम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल भी है।
सत्र के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह समेत केंद्रीय मंत्रिपरिषद के सदस्य और विपक्ष की ओर से राहुल गांधी सहित अनेक सांसद सदन में मौजूद थे। सदन में जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी थी, लेकिन संवाद और बहस का अवसर लगभग नहीं बन सका। यह स्थिति सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय होनी चाहिए।
पूरे मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच लगातार टकराव देखने को मिला। विपक्ष ने सरकार को घेरने के लिए विभिन्न मुद्दे उठाए और चर्चा तथा जवाबदेही की मांग की। दूसरी ओर सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज में रुकावट डालने का आरोप लगाया। संसद परिसर से लेकर सदन के भीतर तक विरोध और नारेबाजी का सिलसिला चलता रहा।
हंगामा लोकतंत्र का विकल्प नहीं
लोकतंत्र में विरोध विपक्ष का अधिकार है और सरकार से सवाल पूछना उसकी जिम्मेदारी। इसी तरह सरकार का यह दायित्व है कि वह विपक्ष के सवालों का जवाब दे और महत्वपूर्ण विषयों पर सार्थक चर्चा का रास्ता बनाए। लेकिन जब विरोध इतना बढ़ जाए कि सदन में चर्चा ही संभव न हो, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना कमजोर पड़ती है।
संसद में नारेबाजी हो सकती है, विरोध हो सकता है, तीखे सवाल हो सकते हैं और राजनीतिक मतभेद भी स्वाभाविक हैं। लेकिन इन सबके बीच संवाद का रास्ता बंद नहीं होना चाहिए। संसद की उत्पादकता केवल इस बात से तय नहीं होती कि कितने विधेयक पारित हुए, बल्कि इससे भी होती है कि उन विधेयकों और राष्ट्रीय मुद्दों पर कितनी गंभीर बहस हुई।
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी
संसद में गतिरोध के लिए केवल एक पक्ष को जिम्मेदार ठहराना आसान है, लेकिन समाधान के लिए दोनों पक्षों को जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। सरकार को विपक्ष की वैध चिंताओं को सुनने और चर्चा के लिए पर्याप्त अवसर देने की जरूरत है। वहीं विपक्ष को भी यह समझना होगा कि हर विरोध का अंतिम लक्ष्य सदन को रोक देना नहीं, बल्कि सरकार से जवाब हासिल करना होना चाहिए।
यदि हर गंभीर मुद्दा नारेबाजी में बदल जाए और हर राजनीतिक असहमति सदन की कार्यवाही रोकने तक पहुंच जाए, तो नुकसान अंततः जनता का होता है। जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद में इसलिए भेजती है कि वे उसके सवाल उठाएं, न कि संसद को लगातार ठप रखें।
एक मिनट की कार्यवाही बड़ा संदेश छोड़ गई
मानसून सत्र के अंतिम दिन लोकसभा की बेहद संक्षिप्त कार्यवाही ने राजनीति के सामने एक आईना रख दिया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को इस पर विचार करना होगा कि क्या संसद की गरिमा और कार्यवाही को राजनीतिक टकराव से ऊपर रखा जा सकता है।
संसद लोकतंत्र का अखाड़ा नहीं, लोकतांत्रिक संवाद का सर्वोच्च मंच है। यहां सरकार को जवाब देना है, विपक्ष को सवाल पूछने हैं और दोनों को मिलकर देश के लिए कानून और नीतियां बनानी हैं।
एक मिनट में कार्यवाही समाप्त होना अपने आप में असामान्य दृश्य हो सकता है, लेकिन इससे उठने वाला सवाल बहुत बड़ा है,क्या देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मंच पर राजनीतिक मतभेद बहस का रूप लेंगे या हंगामे का?
जनता को सत्ता पक्ष से भी जवाबदेही चाहिए और विपक्ष से भी जिम्मेदारी। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि असहमति रहे, संघर्ष हो, तीखे सवाल हों, लेकिन संवाद का दरवाजा कभी बंद न हो।संसद चलेगी तभी लोकतंत्र की आवाज प्रभावी ढंग से सुनी जाएगी।


