फर्रुखाबाद। कोतवाली फतेहगढ़ की कर्नलगंज चौकी में तैनात उपनिरीक्षक मुलेन्द्र चतुर्वेदी की चौकी क्षेत्र में प्रभाव रखने वाले कुख्यात अपराधी और माफिया अनुपम दुबे के गुर्गे अवधेश मिश्रा के साथ नजदीकियां इन दिनों चौकाने वाली हैं। आम जनमानस का कहना है कि पुलिस की वर्दी में कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी का किसी विवादित व्यक्ति के साथ इस तरह घुलना-मिलना आखिर किस मजबूरी या स्वार्थ का संकेत है?
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि दरोगा मुलेन्द्र चतुर्वेदी और अवधेश मिश्रा के बीच बेहद करीबी संबंध हैं। दरोगा नियमित रूप से उसके ठिकानो पर दावतों में शामिल होते हैं और नियमित चरण-वंदन से भी गुरेज नहीं । इन आरोपों ने पुलिस की निष्पक्षता और चौकी की कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
अवधेश मिश्रा को लेकर पूर्व में भी विभिन्न माध्यमों पर गंभीर आरोप और विवाद सामने आते रहे हैं। उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों में उसके खिलाफ आपराधिक मामलों तथा चर्चित माफिया अनुपम दुबे के नेटवर्क से संबंधों का उल्लेख किया गया है। हालांकि ऐसे आरोपों की पुष्टि प्रत्येक मामले में आधिकारिक अभिलेखों और न्यायिक निष्कर्षों से अलग-अलग की जानी आवश्यक है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी पुलिसकर्मी के किसी ऐसे व्यक्ति से करीबी संबंध हैं जिसके खिलाफ आपराधिक गतिविधियों को लेकर शिकायतें या मुकदमे रहे हैं, तो क्या संबंधित अधिकारी को उसी क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी देना उचित है? क्या पुलिस विभाग ने ऐसे संबंधों की कभी जांच कराई? और यदि आरोप गलत हैं तो संबंधित दरोगा इन आरोपों को सार्वजनिक रूप से खारिज करने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं?
मामले का दूसरा पहलू कथित आर्थिक लेन-देन से जुड़ा है। आरोप लगाने वाले लोगों का दावा है कि कथित मेलजोल के पीछे आर्थिक लाभ का खेल हो सकता है। हालांकि किसी भी कथित ‘काली कमाई’ या अवैध भुगतान की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है, इसलिए इस बिंदु की निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी हो जाती है।
पुलिस विभाग यदि वास्तव में पारदर्शिता और शून्य सहनशीलता की नीति पर काम कर रहा है तो इन आरोपों को महज अफवाह बताकर खारिज करने के बजाय तथ्यों की जांच करानी चाहिए। चौकी पर तैनाती, संबंधित व्यक्ति से पुलिसकर्मी के संपर्क, सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल संपर्क, सार्वजनिक स्थानों पर मुलाकातों और किसी भी संभावित आर्थिक लेन-देन की जांच से तस्वीर साफ हो सकती है।
जिले में अपराध और अपराधियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यदि किसी पुलिसकर्मी पर अपराध से जुड़े व्यक्ति को संरक्षण देने का आरोप लगता है तो यह केवल एक कर्मचारी पर आरोप नहीं, बल्कि पूरे पुलिस तंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय बन जाता है।


