शरद कटियार
उत्तर प्रदेश में सरकारी और सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे के खिलाफ योगी सरकार का अभियान केवल प्रशासनिक कार्रवाई का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह शासन की उस नीति का संकेत है जिसमें सार्वजनिक संपत्ति को निजी स्वार्थों से बचाकर विकास की धुरी बनाने की कोशिश की जा रही है। राजस्व विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले साढ़े नौ वर्षों में प्रदेश में 84,005 हेक्टेयर से अधिक भूमि को अवैध अतिक्रमण से मुक्त कराया गया है। यह क्षेत्रफल लगभग 2.08 लाख एकड़ के बराबर है। आंकड़ा निश्चित रूप से बड़ा है, लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि इस जमीन का आगे क्या होगा?
सरकारी जमीन पर कब्जा केवल जमीन का विवाद नहीं होता। इसके पीछे अक्सर सत्ता, प्रभाव, धन और प्रशासनिक तंत्र की कमजोरियों का गठजोड़ काम करता है। जब कोई व्यक्ति या समूह सार्वजनिक भूमि पर कब्जा कर लेता है तो उसका नुकसान सीधे आम नागरिक को होता है। स्कूल, अस्पताल, सड़क, पार्क, सरकारी कार्यालय, उद्योग या अन्य विकास परियोजनाओं के लिए उपलब्ध जमीन कम होती जाती है। इसलिए अतिक्रमण हटाना आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कब्जामुक्त जमीन को दोबारा कब्जे में जाने से बचाना और उसका पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित करना।
सरकार ने अवैध कब्जों से निपटने के लिए राज्य, मंडल, जनपद और तहसील स्तर पर एंटी भू-माफिया टास्क फोर्स गठित की। इसका उद्देश्य केवल कब्जा हटाना नहीं, बल्कि शिकायत की पहचान, जांच, कार्रवाई और जमीन को वास्तविक रूप से अतिक्रमणमुक्त कराने तक पूरी प्रक्रिया को संस्थागत बनाना है।
एंटी भू-माफिया पोर्टल इस व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी बना है। नागरिकों को ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने का माध्यम मिलने से प्रशासनिक कार्रवाई को ट्रैक करने की सुविधा भी उपलब्ध हुई। आंकड़ों के मुताबिक पोर्टल पर 4,34,016 शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से 4,31,697 शिकायतों, यानी 99 प्रतिशत से अधिक का निस्तारण किया जा चुका है। हालांकि 2,319 लंबित शिकायतें यह याद दिलाती हैं कि अभियान की सफलता का पैमाना केवल निस्तारित शिकायतों की संख्या नहीं, बल्कि वास्तविक और न्यायपूर्ण निस्तारण होना चाहिए।
84,005 हेक्टेयर भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराना बड़ी उपलब्धि है। लेकिन सरकारी जमीन खाली होने के बाद यदि वह वर्षों तक अनुपयोगी पड़ी रहती है तो अभियान का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। यही वह बिंदु है जहां सरकार की अगली परीक्षा शुरू होती है। इतनी बड़ी भूमि को व्यवस्थित लैंडबैंक में बदलकर उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, आवास और अन्य आधारभूत परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि पारदर्शी भूमि बैंक विकसित होता है तो निवेशकों को जमीन उपलब्ध कराने में समय कम होगा और विकास परियोजनाओं को गति मिल सकती है।
फार्मास्युटिकल और मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों से लेकर लॉजिस्टिक पार्क, विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज और अन्य बड़े निवेश प्रस्तावों तक के लिए भूमि की उपलब्धता उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को नई गति दे सकती है। इसका सीधा असर रोजगार पर भी पड़ सकता है।
सरकार ने अतिक्रमण हटाने के साथ आपराधिक और राजस्व कार्रवाई का रास्ता भी अपनाया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अभियान के तहत 25,068 राजस्व वाद, 1,168 सिविल वाद और 4,751 एफआईआर दर्ज कराई गईं। वहीं 1,413 अतिक्रमणकर्ताओं को भू-माफिया के रूप में चिह्नित किया गया और इनमें 144 वर्तमान में जेल में बंद बताए गए हैं।
आईपीसी, दंड प्रक्रिया संहिता, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, गैंगस्टर एक्ट और गुंडा एक्ट समेत विभिन्न कानूनी प्रावधानों के तहत भी कार्रवाई की गई। इससे यह संदेश गया कि सरकारी जमीन पर कब्जे को महज राजस्व विवाद मानकर छोड़ देने का दौर खत्म करने की कोशिश हो रही है।
भूमाफिया विरोधी अभियान की सफलता तभी स्थायी मानी जाएगी जब कार्रवाई राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक प्रभाव से परे होकर समान रूप से हो। किसी गरीब की झोपड़ी और किसी प्रभावशाली व्यक्ति के बड़े कब्जे के लिए कानून की अलग-अलग कसौटी नहीं होनी चाहिए। जहां अवैध कब्जा है, वहां कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन वैध स्वामित्व, न्यायालयीन विवाद और वास्तविक कब्जे के बीच स्पष्ट अंतर करते हुए विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन भी उतना ही जरूरी है।
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कब्जामुक्त कराई गई जमीन की डिजिटल मैपिंग हो, उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक हो और यह जानकारी उपलब्ध रहे कि कौन-सी जमीन किस विभाग के पास है तथा उसका भविष्य में क्या उपयोग प्रस्तावित है। पारदर्शिता जितनी अधिक होगी, दोबारा कब्जे की संभावना उतनी ही कम होगी।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में जमीन विकास की सबसे महत्वपूर्ण परिसंपत्तियों में से एक है। उद्योग लगाने के लिए पूंजी चाहिए, लेकिन उद्योग को जमीन भी चाहिए। अस्पताल, विश्वविद्यालय, सड़क, ट्रांसपोर्ट हब और लॉजिस्टिक पार्क के लिए भी भूमि आवश्यक है। ऐसे में अतिक्रमण से मुक्त कराई गई जमीन यदि सुनियोजित लैंडबैंक का हिस्सा बनती है तो यह आने वाले वर्षों में राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण पूंजी साबित हो सकती है।
लेकिन जमीन का आवंटन भी उतना ही पारदर्शी होना चाहिए। यदि सरकारी भूमि को प्रभावशाली लोगों या चुनिंदा संस्थाओं के पक्ष में अपारदर्शी तरीके से आवंटित किया गया तो भूमाफिया के खिलाफ पूरी कवायद पर सवाल उठेंगे। इसलिए जमीन की उपलब्धता से लेकर आवंटन और उपयोग तक प्रत्येक चरण को डिजिटल और सार्वजनिक निगरानी के दायरे में लाना समय की मांग है।
योगी सरकार ने अवैध कब्जों के खिलाफ कठोर रुख अपनाकर एक बड़ा प्रशासनिक अभियान खड़ा किया है। 84,005 हेक्टेयर भूमि की मुक्ति और 99 प्रतिशत से अधिक शिकायतों के निस्तारण के आंकड़े इसकी व्यापकता बताते हैं। मगर किसी भी अभियान की वास्तविक सफलता उसके परिणामों की स्थायित्व में होती है।
अब सरकार को तीन मोर्चों पर समान गंभीरता दिखानी होगी,कब्जामुक्त भूमि का संरक्षण, पारदर्शी लैंडबैंक और समयबद्ध विकासात्मक उपयोग। यदि यह जमीन उद्योगों को निवेश दे, युवाओं को रोजगार दे, अस्पताल और विश्वविद्यालय बनाए, सड़क और बुनियादी ढांचे का विस्तार करे तो भूमाफिया विरोधी अभियान केवल अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं रहेगा, बल्कि उत्तर प्रदेश के विकास मॉडल का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाएगा।
भूमाफिया के खिलाफ कार्रवाई का उद्देश्य केवल बुलडोजर चलाना नहीं होना चाहिए; उसका अंतिम लक्ष्य यह होना चाहिए कि जनता की जमीन जनता के विकास में लगे। यही किसी भी एंटी भूमाफिया अभियान की सबसे बड़ी और स्थायी सफलता होगी।


