30.5 C
Lucknow
Saturday, August 8, 2026

अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस (9अगस्त) पर विशेष- प्रतीकात्मक सम्मान नहीं, संवैधानिक अधिकार चाहिए

Must read

 

(उमंग सिंघार-विनायक फीचर्स)

‘विश्व आदिवासी दिवस’ की सभी बहनों-भाइयों और युवाओं को जोहार!
9 अगस्त का दिन सिर्फ एक तारीख नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया में हमारे अस्तित्व, हमारी जीवंत संस्कृति और हमारे पुरखों के संघर्ष को याद करने का दिन है। मैं जब भी अपने जंगलों, पहाड़ों और अपनी माटी के बीच पहुँचता हूँ, तो मुझे एक अजीब सा सुकून मिलता है। यह वही माटी है जिसने हमें सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाया है। हम आदिवासी केवल प्रकृति के बीच रहते नहीं हैं, हम प्रकृति को जीते हैं। हमारी सोच, हमारी जीवनशैली और हमारे संस्कार प्रकृति के साथ गहरे तालमेल की अनूठी मिसाल हैं।
प्रकृति ही हमारा ईश्वर, सह-अस्तित्व ही हमारा धर्म हमारे समाज में वन, पर्वत और नदियाँ केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, वे हमारे पूज्य देव और पूर्वज हैं। हम धरती को ‘माता’ और आकाश को ‘पिता’ मानकर सिर झुकाते हैं। हम जानते हैं कि जब तक जंगल सुरक्षित हैं, जब तक नदियाँ बह रही हैं, तभी तक मानव जीवन की भी सांस चल रही हैं।
हमारी सामुदायिकता हमारी सबसे बड़ी ताकत है। हमारे यहाँ ‘मैं’ नहीं, हमेशा ‘हम’ की भावना होती है। व्यक्तिगत लाभ के ऊपर पूरे कुनबे और समाज की भलाई को आगे रखना ही हमारा मूल स्वभाव है। हमारी संस्कृति किसी जाति-पांति, ऊंच-नीच या गैर-बराबरी को नहीं मानती। हमारे समाज में हमारी माताओं-बहनों को हमेशा सर्वोच्च और सम्मानजनक स्थान मिला है। हमारा जीवन श्रम की खुशबू से महकता है। हमारी सुबह-शाम मेहनत और कुदरत के चक्र से तय होती हैं।
जब हम मांदल की थाप पर अपने पारंपरिक पर्वों पर थिरकते हैं, तो हमारे ये लोकनृत्य और गीत केवल मनोरंजन नहीं होते। यह ब्रह्मांड, बारिश, मिट्टी और फसलों के साथ हमारा सीधा संवाद होता है।
इस ऐतिहासिक अवसर पर जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मेरा दिल दर्द और आक्रोश से भर जाता है। मध्यप्रदेश, जो देश में सबसे अधिक आदिवासी आबादी वाला प्रदेश है, आज यहां की भाजपा सरकार की नीतियां हमारे समुदाय के खिलाफ़ खड़ी हैं। सरकार बड़े-बड़े मंचों से ‘आदिवासी गौरव’ के दावे करती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि हमारे जल, जंगल और जमीन को कॉर्पोरेट घरानों के हाथों बेचा जा रहा है।
वन अधिकार अधिनियम (एफआईए) का मज़ाक
हमारे पुरखों की ज़मीन पर जिस आदिवासी का पहला हक़ होना चाहिए, आज उसे अपने ही जंगल से बेदखल किया जा रहा है। वन अधिकार पट्टों के नाम पर आदिवासियों को सिर्फ़ झुनझुना थमाया जा रहा है। लाखों आवेदन ख़ारिज कर दिए गए।

पेसा कानून’ की हकीकत

कागज़ों पर तो ‘पेसा कानून’ लागू कर दिया गया, लेकिन ग्राम सभाओं के वास्तविक अधिकार छीनकर नौकरशाही के हवाले कर दिए गए।

सुरक्षा और सम्मान पर हमला

आज मध्यप्रदेश में आदिवासी युवाओं और बहनों पर अत्याचार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ज़मीन छीनने का विरोध करने पर हमारे लोगों को आपराधिक मामलों में फँसाया जाता है।

आदिवासी धर्म कोड

हमारा समाज हजारों वर्षों से अपनी अलग पहचान, अपनी संस्कृति, परंपराओं, रीति-रिवाजों और प्रकृति से जुड़े जीवन मूल्यों के साथ जीता आया है। लेकिन आज भी जब देश में जनगणना होती है, तब आदिवासी समाज के लिए अलग धर्म कोड का कोई कॉलम नहीं है। लंबे अरसे से आदिवासी समाज इसकी मांग कर रहा है। साल 2027 में देश की 16वीं जनगणना होने जा रही है। हमारी मांग है कि जनगणना 2027 में आदिवासी धर्म कोड का अलग कॉलम सुनिश्चित किया जाए।
हमारा संकल्प है कि हम अपनी माटी का हक़ लेकर रहेंगे! आखिर ये भाजपा सरकार की कैसी आदिवासी नीति है, जहाँ हमारी संस्कृति का इस्तेमाल सिर्फ़ वोटों की राजनीति और सरकारी उत्सवों के प्रचार तक सीमित कर दिया गया है? क्या आदिवासियों को केवल प्रतीकात्मक सम्मान चाहिए? नहीं! हमें हमारी ज़मीन का मालिकाना हक़ चाहिए, हमारे बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए, हमारे युवाओं के लिए रोज़गार चाहिए और अपनी जल-जंगल-जमीन पर अपना संवैधानिक अधिकार चाहिए।
मैं मध्यप्रदेश विधानसभा में केवल विपक्ष का नेता बनकर नहीं बैठता, मैं उस आख़िरी आदिवासी भाई की आवाज़ बनकर बोलता हूँ, जिसकी ज़मीन छीनी जा रही है। टंट्या मामा, बिरसा मुंडा और रानी दुर्गावती के लहू का स्वाभिमान हमारी रगों में दौड़ रहा है।
‘विश्व आदिवासी दिवस’ पर मैं आप सभी से आह्वान करता हूँ कि अपनी पहचान, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए एक जुट हो जाइए। हम अपनी माटी का सौदा नहीं होने देंगे। हम लड़ेंगे भी और अपना हक़ लेंगे भी! जय जोहार! जय आदिवासी! (लेखक मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं) (विनायक फीचर्स)

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article