डॉ विजय गर्ग
जब भी हम जैव विविधता की बात करते हैं, तो हमारी कल्पना में घने जंगल, नदियाँ, महासागर, पक्षी, जानवर और रंग-बिरंगे पौधे आते हैं। लेकिन पृथ्वी पर जीवन का एक विशाल संसार ऐसा भी है जो हमारी आँखों से पूरी तरह ओझल है। यह संसार धरती की सतह के नीचे, मिट्टी की परतों और चट्टानों के बीच मौजूद है। हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने भूमिगत जैव विविधता पर किए गए शोधों के माध्यम से ऐसे अनेक रहस्यों का खुलासा किया है, जिन्होंने जीवन और पारिस्थितिकी के बारे में हमारी समझ को नई दिशा दी है।
मिट्टी केवल धूल या खनिजों का मिश्रण नहीं है, बल्कि यह अरबों जीवों का घर है। एक मुट्ठी स्वस्थ मिट्टी में अरबों सूक्ष्मजीव, हजारों प्रकार के बैक्टीरिया, कवक, शैवाल, प्रोटोजोआ, नेमाटोड, केंचुए, कीट और अनेक सूक्ष्म जीव-जंतु पाए जाते हैं। ये सभी मिलकर मिट्टी को जीवित बनाए रखते हैं और पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर ज्ञात प्रजातियों का एक बड़ा हिस्सा अभी तक खोजा ही नहीं गया है और उनमें से अधिकांश भूमिगत जीवन से जुड़ी हो सकती हैं। आधुनिक डीएनए अनुक्रमण (DNA Sequencing), मेटाजीनोमिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों की सहायता से शोधकर्ताओं ने मिट्टी में मौजूद असंख्य सूक्ष्मजीवों की पहचान शुरू की है। इनमें से अनेक ऐसे हैं जिन्हें पहले कभी देखा या वर्गीकृत नहीं गया था।
भूमिगत जैव विविधता का सबसे महत्वपूर्ण योगदान मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में है। सूक्ष्मजीव मृत पौधों और जीवों को विघटित कर पोषक तत्वों को पुनः मिट्टी में लौटाते हैं। यही प्रक्रिया पौधों को आवश्यक नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और अन्य पोषक तत्व उपलब्ध कराती है। यदि ये सूक्ष्म जीव न हों, तो प्राकृतिक पोषक चक्र लगभग ठप पड़ जाएगा और कृषि उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित होगा।
धरती के नीचे रहने वाले कवक और पौधों की जड़ों के बीच बनने वाला सहजीवी संबंध, जिसे माइकोराइजा (Mycorrhiza) कहा जाता है, प्रकृति की सबसे अद्भुत व्यवस्थाओं में से एक है। यह संबंध पौधों को पानी और खनिज तत्वों के अवशोषण में सहायता करता है, जबकि कवकों को पौधों से भोजन प्राप्त होता है। वैज्ञानिक इसे जंगलों और कृषि दोनों के स्वास्थ्य का आधार मानते हैं।
भूमिगत जैव विविधता जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। स्वस्थ मिट्टी बड़ी मात्रा में कार्बन को अपने भीतर संग्रहित कर सकती है। इसे कार्बन सिंक कहा जाता है। यदि मिट्टी का स्वास्थ्य बिगड़ता है, तो यह कार्बन वातावरण में वापस पहुँच सकता है, जिससे वैश्विक तापमान बढ़ने का खतरा और अधिक हो जाता है। इसलिए मिट्टी का संरक्षण जलवायु संरक्षण से सीधे जुड़ा हुआ है।
हाल के शोधों से यह भी संकेत मिले हैं कि मिट्टी में रहने वाले अनेक सूक्ष्मजीव ऐसे रासायनिक यौगिक बनाते हैं जिनसे नई एंटीबायोटिक दवाओं, कैंसररोधी औषधियों और अन्य जीवनरक्षक दवाओं का विकास संभव हो सकता है। मानव स्वास्थ्य के लिए भी यह भूमिगत संसार संभावनाओं का एक विशाल भंडार है।
दुर्भाग्य से यह अनमोल जैव विविधता कई खतरों का सामना कर रही है। अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग, वनों की कटाई, अनियंत्रित शहरीकरण, खनन, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन मिट्टी के जीवों को प्रभावित कर रहे हैं। मिट्टी की गुणवत्ता घटने से केवल कृषि ही नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी को केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखा जाना चाहिए। प्राकृतिक खेती, जैविक खाद, फसल चक्र, वृक्षारोपण और भूमि संरक्षण जैसी विधियाँ भूमिगत जैव विविधता को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। किसानों, वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और आम नागरिकों को मिलकर मिट्टी के स्वास्थ्य को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भूमिगत जैव विविधता पर और अधिक अनुसंधान किया जाए। जितना अधिक हम धरती के नीचे के इस अदृश्य संसार को समझेंगे, उतना ही बेहतर ढंग से हम खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान खोज पाएँगे।
धरती के नीचे छिपा यह जीवन हमें यह सिखाता है कि प्रकृति की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ अक्सर हमारी आँखों से दिखाई नहीं देतीं। जिस मिट्टी पर हम चलते हैं, उसी के भीतर जीवन का एक विशाल और जटिल संसार निरंतर सक्रिय है। इस अदृश्य संसार की रक्षा करना केवल वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी का साझा दायित्व है। भूमिगत जैव विविधता का संरक्षण ही आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ पृथ्वी, सुरक्षित पर्यावरण और टिकाऊ विकास की मजबूत नींव बनेगा।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


