उत्तर प्रदेश विधानसभा में बुधवार को जो दृश्य सामने आया, वह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और संसदीय परंपराओं पर गंभीर चिंतन का विषय भी बन गया। विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना का सदन में यह कहना कि “मैं विचार करूंगा कि क्या मैं इस पद के योग्य हूं या नहीं” केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस पीड़ा की अभिव्यक्ति थी जो तब जन्म लेती है जब सदन की मर्यादा बार-बार राजनीतिक टकराव की भेंट चढ़ने लगती है।
लोकतंत्र की खूबसूरती सहमति में नहीं, बल्कि असहमति को सम्मानपूर्वक व्यक्त करने की संस्कृति में है। सत्ता और विपक्ष का टकराव लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है। विपक्ष का दायित्व सरकार से सवाल पूछना है, वहीं सरकार का दायित्व जवाब देना है। लेकिन जब विरोध शोर, नारेबाजी, व्यक्तिगत आरोपों और संसदीय नियमों की अवहेलना में बदल जाए, तब सबसे अधिक आघात उस संस्था को पहुंचता है, जिसे लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है।
विधानसभा अध्यक्ष किसी राजनीतिक दल के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि पूरे सदन के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं। अध्यक्ष का आसन निष्पक्षता, अनुशासन और संसदीय परंपराओं का प्रतीक होता है। इसलिए उस पद पर बैठे व्यक्ति का सम्मान केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था का सम्मान है। यदि अध्यक्ष स्वयं यह महसूस करने लगें कि उनके निर्देशों का सम्मान नहीं हो रहा, तो यह केवल उनके लिए नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।
हाल के वर्षों में संसद और विधानसभाओं में व्यवधान, नारेबाजी, पोस्टर प्रदर्शन, वेल में पहुंचकर विरोध और कार्यवाही ठप करने की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। दुर्भाग्य से यह प्रवृत्ति अब सामान्य होती जा रही है। इसका सबसे बड़ा नुकसान जनता को होता है, जिसने अपने प्रतिनिधियों को कानून बनाने, जनहित के मुद्दे उठाने और सरकार से जवाब मांगने के लिए सदन में भेजा है। जब पूरा समय हंगामे में बीत जाता है, तब विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और किसानों जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
विपक्ष को विरोध का पूरा अधिकार है और सरकार को आलोचना सुनने का दायित्व निभाना चाहिए। लेकिन विरोध और अव्यवस्था में स्पष्ट अंतर है। यदि हर राजनीतिक दल संसदीय नियमों का पालन करते हुए अपनी बात रखे, तो लोकतंत्र और मजबूत होगा। वहीं सत्ता पक्ष को भी विपक्ष की बात सुनने और संवाद का वातावरण बनाए रखने की जिम्मेदारी निभानी होगी।
सतीश महाना का वक्तव्य सभी दलों के लिए एक संदेश है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से नहीं चलता, बल्कि संस्थाओं के सम्मान, संवाद की संस्कृति और संसदीय मर्यादा से चलता है। यदि विधानमंडल की गरिमा कमजोर होगी तो लोकतंत्र की नींव भी कमजोर होगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता और विपक्ष दोनों दल दलगत राजनीति से ऊपर उठकर आत्ममंथन करें। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति बहस है, टकराव नहीं, संवाद है, शोर नहीं, और मर्यादा है, अराजकता नहीं। विधानसभा की प्रतिष्ठा जितनी मजबूत होगी, जनता का लोकतंत्र पर विश्वास भी उतना ही मजबूत होगा।


