शरद कटियार
देश के करोड़ों युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं, बल्कि उनके वर्षों के परिश्रम, परिवार की उम्मीदों और भविष्य के सपनों का आधार होती हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बार-बार सामने आए पेपर लीक, संगठित नकल और भर्ती घोटालों ने इस भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई है। अनेक परीक्षाएं रद्द हुईं, लाखों अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी और हजारों परिवार आर्थिक व मानसिक संकट से गुजरे। ऐसे माहौल में केंद्र सरकार द्वारा पेपर लीक और परीक्षा में धांधली के खिलाफ कठोर कानून लाना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।
नए कानून के तहत पेपर लीक कराने, प्रश्नपत्रों की खरीद-फरोख्त करने, संगठित तरीके से नकल कराने और भर्ती प्रक्रिया में अवैध हस्तक्षेप करने वालों के लिए 10 वर्ष तक की कठोर कैद और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इतना ही नहीं, परीक्षा संचालन में शामिल एजेंसियों या सेवा प्रदाताओं की मिलीभगत पाए जाने पर उनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई का रास्ता खोला गया है। यह संदेश स्पष्ट है कि अब युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों के लिए कानून पहले से कहीं अधिक कठोर होगा।
हालांकि, केवल कानून बना देने भर से समस्या समाप्त नहीं होगी। वास्तविक चुनौती उसके प्रभावी और निष्पक्ष क्रियान्वयन की है। देश में पहले भी कई मामलों में कठोर कानून बने, लेकिन कमजोर जांच, लंबी न्यायिक प्रक्रिया और दोषियों को समय पर सजा न मिलने के कारण उनका अपेक्षित प्रभाव दिखाई नहीं दिया। यदि इस कानून के अंतर्गत दर्ज मामलों की जांच वर्षों तक लंबित रहती है या प्रभावशाली आरोपी कानूनी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर बच निकलते हैं, तो इसकी कठोरता केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी।
पेपर लीक का नेटवर्क केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं होता। इसमें कई बार शिक्षा माफिया, तकनीकी विशेषज्ञ, प्रिंटिंग इकाइयां, परीक्षा केंद्रों से जुड़े लोग, बिचौलिए और संगठित अपराधी गिरोह शामिल पाए जाते हैं। ऐसे नेटवर्क को तोड़ने के लिए आधुनिक तकनीक, साइबर निगरानी, डिजिटल एन्क्रिप्शन, प्रश्नपत्रों की सुरक्षित आपूर्ति और परीक्षा प्रक्रिया की निरंतर मॉनिटरिंग अनिवार्य होगी। साथ ही, भर्ती एजेंसियों की जवाबदेही भी तय करनी होगी ताकि लापरवाही करने वाले अधिकारियों पर भी कार्रवाई सुनिश्चित हो।
देश के युवाओं की सबसे बड़ी मांग केवल कठोर सजा नहीं, बल्कि निष्पक्ष और समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया है। यदि परीक्षाएं पारदर्शी हों, परिणाम समय पर आएं और दोषियों को शीघ्र दंड मिले, तभी युवाओं का व्यवस्था पर विश्वास दोबारा स्थापित होगा। यह कानून उस दिशा में एक मजबूत शुरुआत हो सकता है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार और जांच एजेंसियां इसे कितनी ईमानदारी और दृढ़ता से लागू करती हैं।
आज आवश्यकता केवल नकल माफियाओं को जेल भेजने की नहीं, बल्कि ऐसी परीक्षा व्यवस्था विकसित करने की है, जहां पेपर लीक की संभावना ही समाप्त हो जाए। करोड़ों युवाओं का भविष्य किसी गिरोह, दलाल या भ्रष्ट तंत्र के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। यदि यह कानून वास्तव में व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और भय का वातावरण स्थापित करता है, तो इसे देश की भर्ती प्रणाली में एक ऐतिहासिक सुधार के रूप में याद किया जाएगा। लेकिन यदि इसका क्रियान्वयन कमजोर रहा, तो यह भी उन अनेक कानूनों की सूची में शामिल हो जाएगा जिनकी मंशा अच्छी थी, पर परिणाम अपेक्षित नहीं मिले। इसलिए अब परीक्षा केवल अभ्यर्थियों की नहीं, बल्कि सरकार, जांच एजेंसियों और पूरी व्यवस्था की भी है।


