शरद कटियार
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संसद है, जहां जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीर चर्चा, बहस और समाधान की उम्मीद की जाती है। लेकिन हाल के दिनों में संसद का दृश्य लगातार बदलता नजर आ रहा है। विरोध-प्रदर्शन, नारेबाजी, पोस्टर, बैनर और कार्यवाही में व्यवधान अब सामान्य बात बनती जा रही है। शुक्रवार को भी राम मंदिर चढ़ावा विवाद को लेकर विपक्ष ने संसद परिसर में अनोखे अंदाज में प्रदर्शन किया, जबकि सदन के भीतर लगातार हंगामे के बीच महत्वपूर्ण विधायी कार्य भी हुए।
विपक्ष का यह अधिकार है कि वह सरकार से जवाब मांगे और जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाए। वहीं सरकार का दायित्व है कि वह विपक्ष की चिंताओं का जवाब तथ्यों और पारदर्शिता के साथ दे। लेकिन जब बहस की जगह केवल टकराव और शोर ले लेता है, तब सबसे बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनता के विश्वास का होता है। संसद में गतिरोध जितना लंबा चलता है, उतना ही महत्वपूर्ण विधेयकों पर गंभीर चर्चा का अवसर कम होता जाता है।
जन्म-मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक जैसे महत्वपूर्ण कानून ध्वनिमत से पारित हो जाना इस बात का संकेत भी है कि हंगामे के बीच कई बार पर्याप्त चर्चा नहीं हो पाती। किसी भी कानून का प्रभाव करोड़ों नागरिकों पर पड़ता है, इसलिए उस पर व्यापक विमर्श लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है। इसी प्रकार यदि विपक्ष किसी संवेदनशील मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करता है, तो सरकार को संवाद के माध्यम से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
संसद के भीतर आरोप-प्रत्यारोप और बाहर सोशल मीडिया पर राजनीतिक बयानबाजी लोकतंत्र का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन इनकी भी एक मर्यादा होनी चाहिए। व्यक्तिगत आरोप, असंसदीय भाषा और लगातार टकराव राजनीतिक माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बनाते हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि जनता ने उन्हें संघर्ष के लिए नहीं, बल्कि समाधान के लिए चुना है।
आज देश शिक्षा, रोजगार, महंगाई, कृषि, स्वास्थ्य और तकनीकी विकास जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में संसद का हर मिनट बहुमूल्य है। यदि यह समय केवल हंगामे की भेंट चढ़ता रहा तो नुकसान अंततः देश और आम नागरिक का ही होगा।
लोकतंत्र की मजबूती इस बात में नहीं कि कौन कितना जोर से विरोध करता है, बल्कि इस बात में है कि असहमति के बावजूद संवाद कितना सार्थक होता है। संसद की गरिमा तभी बनी रहेगी जब सत्ता पक्ष जवाबदेही निभाए और विपक्ष जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाए। लोकतंत्र की असली जीत शोर से नहीं, बल्कि सार्थक बहस, पारदर्शिता और जनहित में लिए गए निर्णयों से होती है।


