– शरद कटियार
देश की न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा उद्देश्य केवल फैसला सुनाना नहीं, बल्कि समय पर न्याय देना भी है। क्योंकि न्याय तभी सार्थक होता है, जब वह उस व्यक्ति के जीवनकाल में मिले, जो न्याय की प्रतीक्षा कर रहा हो। यदि फैसला आने तक व्यक्ति इस दुनिया से ही चला जाए, तो अदालत का निर्णय कानूनी रूप से भले सही हो, लेकिन मानवीय दृष्टि से उसका महत्व अधूरा रह जाता है।
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में सुप्रीम कोर्ट से आखिरकार राहत मिली। अदालत ने उनके खिलाफ जारी समन को निरस्त कर दिया और सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली। लेकिन यह राहत उन्हें तब मिली, जब वह इस दुनिया में नहीं रहे। यह दुर्भाग्य है कि भारत जैसे गणराज्य देश के पूर्व प्रधानमंत्री तक को मिलने में बरसों लग गए आज मिला यह न्याय उनके लिए किस काम का जब वह अपनी अभिव्यक्ति भी व्यक्त नहीं कर सकते हैं।यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं है, बल्कि हमारी न्याय व्यवस्था की गति पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी है। और देश का हर जिम्मेदार व्यक्ति किस व्यवस्था से आहत है।
कोयला आवंटन का मामला वर्ष 2005 का था। जांच शुरू हुई, एफआईआर दर्ज हुई, समन जारी हुए और फिर कानूनी प्रक्रिया वर्षों तक चलती रही। फैसले तक पहुंचने में दो दशक लग गए। इस बीच देश के पूर्व प्रधानमंत्री का निधन हो गया और अंततः अदालत ने कहा कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने का आधार ही नहीं था।
भारत की अदालतों में आज 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। जिला अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट तक लाखों लोग वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कई मामलों में पीड़ित, आरोपी और गवाह तक फैसला आने से पहले दुनिया छोड़ देते हैं। ऐसे में अदालत का अंतिम निर्णय केवल कानूनी रिकॉर्ड बनकर रह जाता है।
यह लेख किसी व्यक्ति विशेष की बेगुनाही या दोष सिद्ध करने का नहीं है। अदालत का फैसला सर्वोपरि है। लेकिन यह घटना हमें याद दिलाती है कि “Justice Delayed is Justice Denied” केवल एक कानूनी कहावत नहीं, बल्कि लाखों भारतीयों की वास्तविकता है।
देश को ऐसी न्याय व्यवस्था की आवश्यकता है, जहां मुकदमों का निस्तारण समयबद्ध हो, अनावश्यक विलंब समाप्त हो और न्याय केवल कागजों पर नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में दिखाई दे। क्योंकि मृत्यु के बाद मिलने वाला न्याय व्यक्ति की प्रतिष्ठा लौटा सकता है, लेकिन उसके जीवन के वे वर्ष कभी वापस नहीं ला सकता, जो उसने अदालतों की प्रतीक्षा में बिताए।
डॉ. मनमोहन सिंह के मामले ने एक बार फिर यह सवाल देश के सामने खड़ा कर दिया है,क्या भारत में न्याय केवल मिलना ही पर्याप्त है, या समय पर मिलना भी उतना ही आवश्यक है?


