(पवन वर्मा-विभूति फीचर्स)
विवेक रंजन श्रीवास्तव का नाम आते ही एक सशक्त राष्ट्रीय व्यंग्यकार की छवि मन में उभरती है। उनकी रचनाएं व्यक्ति और व्यवस्था दोनों पर तीखा लेकिन निर्मल प्रहार करती हैं। किंतु उनके व्यक्तित्व का एक ऐसा पक्ष भी है जिस पर अब तक अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है। वह है परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु निर्माण करने वाले साहित्यकार का पक्ष।
इंजीनियरिंग को उन्होंने केवल पेशा नहीं रहने दिया और साहित्य को केवल भावुक अभिव्यक्ति नहीं बनने दिया। अभियंता होने के कारण उनकी रचनाओं में संरचनात्मक स्पष्टता, तर्क और अनुशासन दिखाई देता है, जबकि साहित्यकार होने के कारण उनमें संवेदना, आत्मीयता और विचार का संतुलन भी मिलता है। यही द्वैत उन्हें अलग पहचान देता है। इसी कारण वे तकनीक, हिंदी और समाज के अंतर्संबंधों पर निरंतर लिखते रहे हैं। कंप्यूटर युग में हिंदी की संभावनाओं को लेकर उनकी चिंता और सक्रियता इसका प्रमाण है।
वे केवल रचनाकार ही नहीं, साहित्यिक विमर्श के सक्रिय सहभागी भी हैं। साहित्य, सिनेमा, भाषा, सोशल मीडिया, हिंदी की तकनीकी संभावनाओं तथा समकालीन सामाजिक प्रश्नों पर उनके लेख उनकी व्यापक वैचारिक दृष्टि का परिचय देते हैं। वे घटनाओं का केवल भावनात्मक चित्रण नहीं करते, बल्कि उनके पीछे कार्यरत सामाजिक प्रवृत्तियों का विश्लेषण भी करते हैं। इसीलिए उनके व्यंग्य व्यक्ति पर नहीं, प्रवृत्ति पर प्रहार करते हैं। वे पाठक को हंसाने के साथ सोचने के लिए भी विवश करते हैं। उनकी ढेरों किताबें उनके और पाठकों के बीच सीधे वैचारिक संवाद का माध्यम बनती हैं।
उनकी साहित्यिक यात्रा विरासत और नवाचार का सुंदर संगम है। साहित्यिक परिवार से मिले संस्कारों को उन्होंने डिजिटल युग की संभावनाओं से जोड़ा। यूनिकोड हिंदी लेखन, सोशल मीडिया और आधुनिक संप्रेषण माध्यमों को अपनाते हुए उन्होंने यह सिद्ध किया कि परंपरा का संरक्षण परिवर्तन के विरोध में नहीं, बल्कि उसके साथ चलकर भी किया जा सकता है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव का एक उल्लेखनीय पक्ष उनकी वैश्विक दृष्टि भी है। संयुक्त अरब अमीरात, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, भूटान, श्रीलंका तथा अन्य अनेक देशों की यात्राओं ने उनके अनुभव संसार का विस्तार किया। इन यात्राओं से प्राप्त सांस्कृतिक और सामाजिक अवलोकन उनकी रचनाओं में भारतीय दृष्टि को अधिक व्यापक और तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हैं। वे पुस्तकों पर गंभीर समीक्षाएं लिखते हैं और साहित्यिक संवाद को प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयात्रा मानते हैं। यही गुण उन्हें केवल लेखक नहीं, साहित्यिक संस्कृति के संवाहक के रूप में भी स्थापित करता है।
वास्तव में विवेक रंजन श्रीवास्तव का सबसे अनछुआ पक्ष उनका यह सेतुकार व्यक्तित्व है। वे साहित्य और विज्ञान, परंपरा और तकनीक, लोक और वैश्विक दृष्टि, हास्य और गंभीरता तथा अनुभव और प्रयोग के बीच एक सृजनात्मक पुल निर्मित करते हैं। यही विशेषता उन्हें समकालीन हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट और बहुआयामी रचनाकार के रूप में पहचान दिलाती है। *(विवेक रंजन श्रीवास्तव इंजीनियर, व्यंग्यकार, तकनीक-हिंदी चिंतक और विभूति फीचर्स के नियमित लेखक हैं। उनके 20 से अधिक व्यंग्य, लघुकथा और निबंध संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। वे हिंदी के डिजिटल लेखन और साहित्यिक विमर्श में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। 28 जुलाई को उनका जन्मदिन है)* *(विभूति फीचर्स)*


