सेवा राम चौधरी
सड़कें किसी भी देश के विकास की पहचान होती हैं। बेहतर सड़कें व्यापार को गति देती हैं, लोगों को जोड़ती हैं और आर्थिक गतिविधियों को मजबूत बनाती हैं। लेकिन यही सड़कें तब भय का कारण बन जाती हैं, जब हर दिन सैकड़ों लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाने लगते हैं। सड़क हादसे अब केवल एक समाचार नहीं रह गए हैं, बल्कि देश के सामने एक गंभीर सामाजिक, आर्थिक और मानवीय संकट बन चुके हैं।
लगभग हर दिन किसी न किसी सड़क पर तेज रफ्तार, लापरवाही या नियमों की अनदेखी के कारण किसी परिवार का चिराग बुझ जाता है। कोई बच्चा अपने पिता को खो देता है, कोई मां अपने बेटे को और कोई पत्नी अपने जीवनसाथी को। एक क्षण की असावधानी कई परिवारों के जीवनभर के दर्द में बदल जाती है।
सड़क दुर्घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण मानवीय लापरवाही है। तेज गति से वाहन चलाना, शराब या नशीले पदार्थों के सेवन के बाद ड्राइविंग करना, मोबाइल फोन पर बात करना या संदेश देखना, बिना हेलमेट दोपहिया चलाना, सीट बेल्ट न लगाना, ओवरलोडिंग, गलत दिशा में वाहन चलाना और ट्रैफिक सिग्नलों की अनदेखी जैसी आदतें हर दिन लोगों की जान ले रही हैं। यह विडंबना है कि अधिकांश हादसे तकनीकी खराबी से नहीं, बल्कि हमारी गलत सोच और लापरवाही से होते हैं।
आज भी अनेक लोग हेलमेट और सीट बेल्ट को सुरक्षा उपकरण नहीं, बल्कि पुलिस चालान से बचने का साधन मानते हैं। जैसे ही ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी खत्म होती है, नियमों की भी अनदेखी शुरू हो जाती है। यह सोच बदलनी होगी। सड़क सुरक्षा का पालन सरकार के लिए नहीं, बल्कि अपने और अपने परिवार के जीवन की रक्षा के लिए किया जाना चाहिए।
देश में एक्सप्रेसवे, राष्ट्रीय राजमार्ग और आधुनिक सड़क नेटवर्क तेजी से विकसित हो रहे हैं। बेहतर सड़कें आवश्यक हैं, लेकिन यदि सड़क उपयोग करने वालों में अनुशासन नहीं होगा तो आधुनिक बुनियादी ढांचा भी दुर्घटनाओं को नहीं रोक पाएगा। सड़क सुरक्षा केवल इंजीनियरिंग का विषय नहीं, बल्कि नागरिक संस्कृति का भी प्रश्न है।
सड़क दुर्घटनाओं का आर्थिक प्रभाव भी बेहद गंभीर होता है। एक कमाने वाले सदस्य की मृत्यु या गंभीर चोट पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर देती है। इलाज, पुनर्वास और आय के नुकसान का बोझ वर्षों तक परिवार को झेलना पड़ता है। इसलिए सड़क सुरक्षा को केवल यातायात का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास और सामाजिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए।
पुलिस और परिवहन विभाग लगातार जागरूकता अभियान चलाते हैं, चालान करते हैं और नियमों का पालन कराने का प्रयास करते हैं। लेकिन केवल दंड से स्थायी समाधान संभव नहीं है। आवश्यकता है कि सड़क सुरक्षा को सामाजिक अभियान बनाया जाए। विद्यालयों और महाविद्यालयों में यातायात शिक्षा को व्यवहारिक रूप से पढ़ाया जाए। ड्राइविंग लाइसेंस देने की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी तथा कठोर बनाया जाए। सार्वजनिक परिवहन चालकों को नियमित प्रशिक्षण दिया जाए और सड़क निर्माण में सुरक्षा मानकों का पूरी गंभीरता से पालन किया जाए।
परिवार की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि माता-पिता स्वयं ट्रैफिक नियमों का पालन करेंगे, तो बच्चे भी वही सीखेंगे। बच्चों को बचपन से ही हेलमेट पहनने, सीट बेल्ट लगाने, ज़ेब्रा क्रॉसिंग का उपयोग करने और यातायात संकेतों का सम्मान करने की आदत डालनी चाहिए।
पैदल यात्रियों और साइकिल चालकों की सुरक्षा पर भी बराबर ध्यान देना होगा। फुटपाथों पर अतिक्रमण, खराब स्ट्रीट लाइट, अवैध कट और लापरवाही से सड़क पार करना भी दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण बनते हैं। सुरक्षित सड़कें तभी बनेंगी, जब वाहन चालक और पैदल यात्री दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को समझेंगे।
सड़क पर निकलते समय हमें यह याद रखना चाहिए कि घर पर कोई हमारा इंतजार कर रहा है। कुछ मिनट पहले पहुंचने की जल्दबाजी जीवनभर का पछतावा बन सकती है। जिम्मेदार चालक वही है जो अपनी ही नहीं, दूसरों की सुरक्षा का भी ध्यान रखे।
सड़क सुरक्षा कानून का विषय अवश्य है, लेकिन उससे पहले यह जीवन के प्रति हमारी जिम्मेदारी का विषय है। जब तक हमारी सोच नहीं बदलेगी, तब तक दुर्घटनाओं के आंकड़े भी नहीं बदलेंगे। सुरक्षित यात्रा का पहला नियम है,गति पर नियंत्रण, नियमों का सम्मान और जीवन को सर्वोपरि मानना। क्योंकि मंजिल तक पहुंचना तभी सार्थक है, जब हम सुरक्षित पहुंचें।


