परीक्षा की शुचिता ही युवाओं के भविष्य की सबसे बड़ी गारंटी
— प्रशांत कटियार
भारत दुनिया का सबसे युवा देश बनने की ओर अग्रसर है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। हर वर्ष करोड़ों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठते हैं। कोई डॉक्टर बनने का सपना देखता है, कोई इंजीनियर, कोई प्रशासनिक अधिकारी तो कोई शिक्षक। इन युवाओं के लिए परीक्षा केवल एक प्रश्नपत्र नहीं होती, बल्कि वर्षों की मेहनत, परिवार के त्याग और भविष्य की उम्मीदों का परिणाम होती है।
लेकिन जब किसी परीक्षा की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, प्रश्नपत्र लीक होने की खबरें सामने आती हैं या भर्ती प्रक्रियाएं वर्षों तक अधर में लटक जाती हैं, तब केवल एक परीक्षा प्रभावित नहीं होती, बल्कि लाखों युवाओं का भरोसा भी टूटता है।
देश में पिछले कुछ वर्षों में कई प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर विवाद सामने आए। कहीं परीक्षा रद्द करनी पड़ी, कहीं भर्ती प्रक्रिया न्यायालयों तक पहुंची, तो कहीं अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी। इन घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर युवाओं की सबसे बड़ी पूंजी—विश्वास—को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी किसकी है?
शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि प्रतिभा को अवसर देना है। यदि मेहनत करने वाला छात्र यह महसूस करने लगे कि उसका भविष्य व्यवस्था की कमियों पर निर्भर है, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए चिंताजनक स्थिति है।
सरकारों ने परीक्षा प्रणाली को डिजिटल बनाने, सुरक्षा बढ़ाने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। आधुनिक तकनीक, बायोमेट्रिक सत्यापन, सीसीटीवी निगरानी और एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। यह सकारात्मक प्रयास हैं, लेकिन इनका वास्तविक मूल्य तभी है जब अभ्यर्थियों के मन में यह विश्वास बने कि परीक्षा निष्पक्ष होगी और परिणाम समय पर आएंगे।
आज आवश्यकता केवल नई परीक्षाएं कराने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जहां प्रश्नपत्र लीक होने की आशंका न्यूनतम हो, भर्ती प्रक्रिया निर्धारित समय सीमा में पूरी हो और किसी भी अनियमितता पर त्वरित तथा कठोर कार्रवाई हो। युवाओं को यह भरोसा मिलना चाहिए कि उनकी मेहनत का मूल्य किसी सिफारिश, भ्रष्टाचार या तकनीकी लापरवाही से कम नहीं होगा।
इस पूरे विषय में राजनीतिक दलों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षा और रोजगार जैसे विषयों को तात्कालिक राजनीतिक लाभ से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में देखा जाना चाहिए। सत्ता में हो या विपक्ष में, हर दल की जिम्मेदारी है कि वह ऐसी परीक्षा व्यवस्था के निर्माण में सहयोग करे जिस पर देश का हर छात्र गर्व कर सके।
एक प्रतियोगी परीक्षा में केवल प्रश्नों के उत्तर नहीं लिखे जाते, बल्कि वहां एक परिवार के सपने, माता-पिता का संघर्ष और युवा का आत्मविश्वास भी दांव पर लगा होता है। यदि परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होगा तो इसका प्रभाव केवल परिणामों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाज के मनोबल पर भी पड़ेगा।
देश को आंदोलनों से अधिक समाधान चाहिए। युवाओं को आश्वासन नहीं, विश्वास चाहिए। और यह विश्वास तभी बनेगा जब परीक्षा व्यवस्था पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी, तकनीकी रूप से सुरक्षित और समयबद्ध होगी।
किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके युवा होते हैं। यदि उनका विश्वास मजबूत रहेगा, तो देश का भविष्य भी मजबूत रहेगा। शिक्षा की असली सफलता किताबों से नहीं, बल्कि एक ऐसी परीक्षा व्यवस्था से तय होगी जिस पर हर अभ्यर्थी बिना किसी संदेह के भरोसा कर सके।
लेखक :यूथ इंडिया न्यूज़ ग्रुप के स्टेट हेड हैं।


