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Monday, July 6, 2026

सीखने की कोई उम्र नहीं होती

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डॉ विजय गर्ग
मनुष्य का जीवन निरंतर सीखने की एक यात्रा है। जन्म से लेकर जीवन के अंतिम पड़ाव तक व्यक्ति हर दिन कुछ नया सीखता है। यही कारण है कि कहा जाता है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा, जिज्ञासा और स्वयं को बेहतर बनाने का संकल्प व्यक्ति को जीवन में आगे बढ़ने और बदलते समय के साथ तालमेल बैठाने में सहायता करता है।

पहले यह माना जाता था कि शिक्षा केवल बचपन और युवावस्था तक सीमित होती है, लेकिन आज के आधुनिक युग में यह सोच तेजी से बदल रही है। तकनीक के विकास और इंटरनेट के विस्तार ने हर आयु वर्ग के लोगों के लिए सीखने के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। आज बुजुर्ग भी स्मार्टफोन, कंप्यूटर और डिजिटल तकनीकों का उपयोग सीख रहे हैं, जबकि युवा नई भाषाएँ, कौशल और व्यवसायिक दक्षताएँ विकसित कर रहे हैं।

सीखना केवल विद्यालयों और पुस्तकों तक ही सीमित नहीं है। जीवन के अनुभव, यात्राएँ, लोगों से मिलने-जुलने और विभिन्न परिस्थितियों का सामना करने से भी व्यक्ति बहुत कुछ सीखता है। एक किसान नई कृषि तकनीकों को अपनाकर सीखता है, एक व्यापारी बाजार की बदलती परिस्थितियों को समझता है और एक गृहिणी परिवार के बेहतर प्रबंधन के लिए नए कौशल विकसित करती है। इस प्रकार हर व्यक्ति अपने जीवन के प्रत्येक चरण में सीखने की प्रक्रिया से जुड़ा रहता है।

आज के प्रतिस्पर्धी युग में जीवन भर सीखते रहना और स्वयं को अद्यतन रखना अत्यंत आवश्यक हो गया है। नई तकनीकों, बदलती रोजगार आवश्यकताओं और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के कारण लोगों को लगातार नए ज्ञान और कौशल अर्जित करने पड़ते हैं। जो लोग सीखने के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं, वे नई चुनौतियों का सामना अधिक आत्मविश्वास के साथ कर पाते हैं और अपने जीवन में सफलता के नए आयाम स्थापित करते हैं।

दुनिया में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहाँ लोगों ने अधिक आयु में नई शुरुआत करके उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। किसी ने सेवानिवृत्ति के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त की, किसी ने नया व्यवसाय शुरू किया और किसी ने कला, साहित्य या संगीत के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। ये उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि सफलता के लिए उम्र नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति, परिश्रम और सीखने की ललक महत्वपूर्ण होती है।

सीखने की आदत व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। नई चीजें सीखने से मस्तिष्क सक्रिय रहता है, सोचने-समझने की क्षमता बढ़ती है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। यह व्यक्ति को जीवन के प्रति आशावादी बनाए रखता है तथा उसे नई संभावनाओं को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है। निरंतर सीखने वाला व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने में भी अधिक सक्षम होता है।

परिवार और समाज की भी यह जिम्मेदारी है कि वे हर आयु वर्ग के लोगों को सीखने के लिए प्रोत्साहित करें। यदि घर और समाज में ऐसा वातावरण बने, जहाँ नई चीजें सीखने को सम्मान और प्रोत्साहन मिले, तो लोग बिना किसी झिझक के अपनी रुचियों और क्षमताओं का विकास कर सकेंगे। इससे न केवल व्यक्तिगत विकास होगा, बल्कि समाज की समग्र प्रगति भी सुनिश्चित होगी।

अंततः, यह सत्य है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। जब तक मनुष्य में जिज्ञासा, उत्साह और आगे बढ़ने की इच्छा बनी रहती है, तब तक वह निरंतर सीख सकता है। ज्ञान का संसार असीमित है और इसकी खोज जीवन को अधिक सार्थक, समृद्ध और आनंदमय बनाती है। इसलिए हमें जीवन के हर चरण में सीखने के अवसरों का स्वागत करना चाहिए और स्वयं को निरंतर विकसित करने का प्रयास करते रहना चाहिए।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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