– तब कटियार हिन्दू हृदय सम्राट थे
– अब चंपत, और बागेश्वर धाम की बात आई तो उनका कद फीका बता रहे
– कुल दो व्यानों ने राम भक्त बजरंगी का भुला दिया एक तबके मे त्याग और बलिदान
शरद कटियार
लखनऊ।विनय कटियार भारतीय राजनीति और राम जन्मभूमि आंदोलन का ऐसा नाम हैं, जिन्हें केवल एक पूर्व सांसद या नेता के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि राम मंदिर आंदोलन के अग्रणी चेहरों में गिना जाता है। पिछले कुछ दिनों से उनके बयानों, विशेषकर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय तथा बागेश्वर धाम को लेकर की गई टिप्पणियों के बाद सोशल मीडिया पर जिस प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आईं, उसने एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब असहमति व्यक्तिगत अपमान, उम्र पर कटाक्ष और अशोभनीय भाषा में बदल जाए, तो यह केवल व्यक्ति नहीं बल्कि समाज की सोच पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। आश्चर्य की बात तो ये कि देश का सबसे ज्यादा बुद्धजीवी तबका सोशल मीडिया पर उन जैसी अन्तर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व पर कटाक्ष कर रहा है।
विनय कटियार का सार्वजनिक जीवन चार दशक से अधिक पुराना है। उन्होंने 1984 में बजरंग दल की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई। वे कई बार लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहे तथा राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान देशभर में हिंदुत्व की राजनीति का प्रमुख चेहरा बने। 1980 और 1990 के दशक में जब अयोध्या आंदोलन अपने चरम पर था, तब लाखों कार्यकर्ताओं को संगठित करने वालों में उनका नाम प्रमुखता से लिया जाता रहा। यही कारण है कि समर्थकों के बीच उन्हें लंबे समय से “हिंदू हृदय सम्राट” जैसी उपाधियों से भी संबोधित किया गया।
हाल के दिनों में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए जुटाए गए चंदे और ट्रस्ट की कार्यप्रणाली को लेकर देश में समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने भी अपने-अपने स्तर पर आरोप लगाए, हालांकि ट्रस्ट ने इन आरोपों का लगातार खंडन किया है। इसी बीच विनय कटियार के कुछ बयानों ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया। बाद में उन्होंने अपने कुछ वक्तव्यों पर सफाई भी दी, लेकिन तब तक सोशल मीडिया पर बहस व्यक्तिगत हमलों में बदल चुकी थी।
सबसे अधिक चिंता की बात यह रही कि कई लोगों ने असहमति व्यक्त करने के बजाय “नींद नहीं है” जैसे शब्दों और अपमानजनक टिप्पणियों का सहारा लिया। यह केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि एक ऐसे वरिष्ठ व्यक्ति के प्रति असम्मान भी था, जिसने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा एक वैचारिक आंदोलन को दिया। लोकतंत्र में विचारों का विरोध होना स्वाभाविक है, लेकिन किसी बुजुर्ग नेता का उपहास करना भारतीय सामाजिक संस्कारों के अनुरूप नहीं माना जाता।
आज जब देश में लगभग 140 करोड़ की आबादी है और करोड़ों लोग स्वयं को भगवान श्रीराम का श्रद्धालु मानते हैं, तब यह अपेक्षा की जाती है कि राम के नाम पर होने वाली चर्चा में कम से कम भाषा की मर्यादा बनी रहे। यदि राम के नाम पर चलने वाली बहस जातीय कटाक्ष, व्यक्तिगत अपमान और सोशल मीडिया की ट्रोल संस्कृति तक सीमित हो जाए, तो यह चिंता का विषय अवश्य बनता है।
यह भी सत्य है कि आज सोशल मीडिया पर वैचारिक मतभेद अक्सर जातीय और राजनीतिक पहचान के चश्मे से देखे जाते हैं। किसी व्यक्ति के पूरे सार्वजनिक जीवन का मूल्यांकन एक बयान के आधार पर कर दिया जाता है। यही प्रवृत्ति समाज में संवाद की जगह टकराव को बढ़ाती है। विनय कटियार से सहमति या असहमति अलग विषय हो सकता है, लेकिन उनके ऐतिहासिक योगदान को नकारना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
राम जन्मभूमि आंदोलन का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें अशोक सिंघल, महंत अवैद्यनाथ, विष्णु हरि डालमिया, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और विनय कटियार जैसे अनेक नाम स्वाभाविक रूप से दर्ज रहेंगे। इन नेताओं के योगदान पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उनके ऐतिहासिक अस्तित्व को मिटाया नहीं जा सकता।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में भाषा की गरिमा बनी रहे। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, किंतु अपमान उसकी कमजोरी। यदि किसी वरिष्ठ नेता के प्रति सम्मान का भाव समाप्त हो जाए और जातीय पहचान ही किसी व्यक्ति के मूल्यांकन का आधार बन जाए, तो यह केवल राजनीति का नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी संकट है।
राम भारतीय संस्कृति में मर्यादा, संयम और सम्मान के प्रतीक हैं। इसलिए यदि राम के नाम पर चलने वाली बहसों में मर्यादा पीछे छूट जाए और कटुता आगे निकल जाए, तो यह आत्ममंथन का विषय अवश्य है। इतिहास व्यक्तियों का मूल्यांकन समय के साथ करता है, लेकिन समाज का मूल्यांकन उसकी भाषा और व्यवहार से होता है। इसलिए किसी भी वैचारिक मतभेद के बीच यह स्मरण रखना आवश्यक है कि व्यक्ति से असहमति हो सकती है, पर सम्मान की मर्यादा नहीं टूटनी चाहिए।


