प्रो. एच. एन. शर्मा
भारत का विभाजन केवल भूगोल का विभाजन नहीं था, वह समाज और राजनीति की दिशा बदलने वाली घटना भी थी। 1947 के बाद देश ने विकास, लोकतंत्र और संस्थाओं की मजबूती का लंबा सफर तय किया, लेकिन इसी दौरान जातीय, धार्मिक और सामाजिक ध्रुवीकरण की राजनीति भी मजबूत होती गई। आज जब राजनीति, पत्रकारिता और सामाजिक जीवन में धनबल का प्रभाव चर्चा का विषय है, तब पुराने दौर के नेताओं और पत्रकारिता की याद स्वाभाविक रूप से आती है।
एक समय था जब राजनीति में विचारधारा, जनसंघर्ष और संगठन की ताकत सबसे बड़ा आधार हुआ करती थी। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जैसे नेता उस दौर के प्रतीक थे। बहुगुणा स्वतंत्रता आंदोलन से निकले नेता थे, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और बाद में राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें साफ-सुथरे प्रशासन और जनाधार वाले नेता के रूप में याद किया जाता है।
चंद्रशेखर का राजनीतिक जीवन भी संघर्ष और वैचारिक प्रतिबद्धता का उदाहरण माना जाता है। वे छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचे, लंबे समय तक संसद में जनता की आवाज बने रहे और 1990-91 में देश के प्रधानमंत्री बने। विशेष बात यह रही कि उनकी पहचान सत्ता से अधिक एक वैचारिक और जनसंवादी नेता की रही।
आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में राजनीति का केंद्र गांव, किसान, मजदूर, शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे हुआ करते थे। चुनाव लड़ना आज की तुलना में अपेक्षाकृत कम खर्चीला था। धीरे-धीरे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ी, चुनावी खर्च बढ़ा और धनबल का प्रभाव भी बढ़ता गया। इसी के साथ जातीय और धार्मिक समीकरण चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए।
पत्रकारिता भी कभी “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ” कहलाने भर तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसे लोकतंत्र की आंख माना जाता था। छोटे-छोटे समाचार पत्र सरकारों को कठघरे में खड़ा कर देते थे। कई संपादक और पत्रकार अपनी सादगी, निर्भीकता और जनपक्षधरता के लिए जाने जाते थे। लेकिन मीडिया उद्योग के विस्तार, विज्ञापन आधारित मॉडल और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने पत्रकारिता के स्वरूप को भी बदल दिया। आज तकनीक और पहुंच बढ़ी है, लेकिन साथ ही यह बहस भी तेज हुई है कि क्या आर्थिक दबावों ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता को प्रभावित किया है।
यह भी सच है कि हर दौर की अपनी चुनौतियां होती हैं। आज का भारत आर्थिक रूप से कहीं अधिक बड़ा, तकनीकी रूप से कहीं अधिक सक्षम और वैश्विक स्तर पर कहीं अधिक प्रभावशाली है। लेकिन इसके साथ यह प्रश्न भी बना हुआ है कि क्या सामाजिक सौहार्द, वैचारिक संवाद और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता को उतनी ही प्राथमिकता मिल रही है जितनी पहले मिलती थी।
बहुगुणा और चंद्रशेखर जैसे नेताओं की चर्चा इसलिए होती है क्योंकि वे केवल पदों से नहीं, अपने व्यक्तित्व और राजनीतिक संस्कृति से पहचाने जाते थे। बहुगुणा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली नेता बने, जबकि चंद्रशेखर बलिया से निकलकर देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे। दोनों नेताओं की राजनीति का आधार व्यक्तिगत वैभव नहीं बल्कि जनसंपर्क और राजनीतिक संघर्ष था।
आज के दौर में जब समाज जाति, धर्म, क्षेत्र और आर्थिक असमानताओं पर बहस कर रहा है, तब इतिहास यह याद दिलाता है कि राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी एकता, सामाजिक समरसता और जागरूक नागरिक समाज में होती है। राजनीति, पत्रकारिता और समाज,तीनों की विश्वसनीयता तभी मजबूत होती है जब उनका केंद्र जनता का हित हो, न कि केवल सत्ता, प्रभाव या आर्थिक लाभ।
यही कारण है कि बहुगुणा और चंद्रशेखर जैसे नाम आज भी केवल इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि राजनीतिक शुचिता और जननेतृत्व के प्रतीक के रूप में याद किए जाते हैं।
लेखक पूर्व पीएम युवा तुर्क चंद्रशेखर के राजनैतिक सलाहकार रहे हैं।


