(पंकज शर्मा “तरुण “-विनायक फीचर्स)
दुनिया के किसी भी देश के नेताओं में तलवे चाटने का हुनर नहीं पाया जाता। यह हुनर केवल बौद्धिक संपदा से ओत- प्रोत देश भारत में बहुतायत से पाया जाता है।चाटने की कला कब से प्रारंभ हुई इसका ठीक से कोई प्रामाणिक उल्लेख किसी भी पौराणिक ग्रन्थ में पढ़ने को तो नहीं मिला मगर देखने में अवश्य आया है,सच्चा चाटुकार वह होता है जो वाणी की वीणा सुर में बजा कर अपने स्वामी का स्वस्थ मनोरंजन कर सके।उसकी मनोवांछित मनोकामनाओं को स्वतः ही समझ कर पूर्ण करने में सतत रूप से ईमानदारी धारण किए दायित्व समझ कर पूर्ण करता रहे। स्वामी को कब क्या चाहिए इसका पूर्ण ज्ञान होना सबसे पहला गुण है।उनसे मिलने आने वाले भक्तों को किस तरीके से मिलने की अनुमति प्रदान करना,किस समय मिलवाना, उनके द्वारा लाए गए चढ़ावे को ले कर भलीभांति स्थान पर सहेज कर संभाल कर रखने की कला में पूरी तरह पारंगत होना चाहिए। सुरक्षा के अन्य उपायों में प्रतिष्ठित मजबूत कुख्यात भाइयों को किस तरह तैयार रखना तथा प्रतिकूल समय में उनका उपयोग किया जाना भी आना चाहिए।
हालांकि इस कला को संकाय के रूप में आज तक किसी भी विश्वविद्यालय में मान्यता नहीं दी है फिर भी विश्व विद्यालयों में इसका व्यावहारिक ज्ञान वहां के उप कुलपतियों तथा विद्वान प्राध्यापकों सहायक प्राध्यापकों द्वारा प्रतिदिन दिया जाता रहा है। उनके द्वारा अपने विषय को किस मात्रा में कितने समय किस तरीके से पढ़ाना उनकी शैली को विद्यार्थी महाविद्यालयों में स्वतः ही ग्रहण करते रहते हैं। डिग्री के ले लेने के पश्चात वे जिस क्षेत्र विशेष में सेवा देने जाते हैं वहां अपने से ऊंचे ओहदेदार के तलवों को चाटना प्रारंभ कर अपनी उत्कृष्ट कला से कुछ ही दिनों में उनके खास म खास अर्थात प्रिय चाटुकार हो जाते हैं। बॉस जिसे हिंदी में स्वामी कह कर पुकारते हैं,उसके सामने सहयोगी साथी मित्रों की कमियों को बातों बातों में उजागर कर उनकी इमेज खराब करना भी आना परमावश्यक है।जिसे साथियों को डांट पड़वाना नहीं आता वह चाटुकारिता की कला में असफल माना जाता है। उदाहरण के रूप में एक पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेता जो पप्पू के नाम से विख्यात हो चुके हैं उनके किस्सों से तो इतिहास भरा पड़ा है वे जहां भी जाते हैं वहां चाटुकार लोग इस कदर सक्रिय हो जाते हैं कि दूसरे दिन ही उनकी पार्टी के कुछ नेता पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टी में चले जाते हैं वे वहां अपनी इस कला से किसी न किसी राज्य के मुख्य मंत्री बन कर या फिर राज्य सभा के सांसद बन कर पप्पू की बखिया उधेड़ने में लग जाते हैं। जो थोड़े बुद्धि प्रसाद होते हैं उन्हें पार्टी प्रवक्ता बना दिया जाता हैं ताकि टेलीविजन के निरर्थक बहस के पापुलर कार्यक्रमों में जा कर अपनी तथा अपने दल की भद्द पिटवा सकें। विशेष योग्यता के रूप में गालियां देना भी आना चाहिए!आप जितनी अच्छी तरह से गालियां दे सकते हैं उतनी आपको इज्जत मिलेगी। बखिया उधेड़ने की यह कला आजकल बहुत प्रचलन में है। किसी भी दल का प्रवक्ता हो यह हुनर चाटुकार में कूट कूट कर भरा होना ही चाहिए। एंकर की एक तरफा एंकरिंग को असफल करना भी आना चाहिए। गोदी मीडिया जैसे भारी भरकम हथ गोले स्टूडियो में कब फोड़ना है इसका ज्ञान भी होना चाहिए!
चाटुकारिता भारतीय राजनीति और अन्य सभी क्षेत्रों का प्रमुख अंग हो चला है। इसी के कारण आज पूरी दुनिया में इसका डंका बजा हुआ है। मेरा तो भारत सरकार से यह अनुग्रह पूर्ण सुझाव है कि इस कला को भारत के विश्वविद्यालयों में अनिवार्य रूप से विषय के रूप में पढ़ाया जाना स्वीकार करें ताकि वर्तमान में जो बेरोजगारी की विपदा युवा वर्ग में दिखाई पड़ रही है नौकरी न मिलने की स्थिति में इस कला से रोजी रोटी कमा सकें। (विनायक फीचर्स)


