शरद कटियार
नागपुर की एक छोटी सी शाखा से शुरू हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज भारत का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन माना जाता है। वर्ष 1925 में स्थापना के बाद संघ ने 100 वर्षों का सफर पूरा कर लिया, लेकिन इस पूरे कालखंड में संगठन कभी किसी बड़े विभाजन या टूट का शिकार नहीं हुआ। भारतीय राजनीति और सामाजिक संगठनों के इतिहास में यह अपने आप में एक असाधारण उदाहरण माना जाता है।
संघ की स्थापना विजयादशमी के दिन 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। उनका उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित कर राष्ट्र जीवन में एकता और अनुशासन स्थापित करना था। उस समय कुछ स्वयंसेवकों के साथ शुरू हुआ यह संगठन आज देश के हजारों नगरों, कस्बों और गांवों तक पहुंच चुका है।
संघ के सार्वजनिक आंकड़ों के अनुसार देशभर में 70 हजार से अधिक दैनिक शाखाएं संचालित हो रही हैं। लाखों स्वयंसेवक प्रतिदिन शाखाओं में भाग लेते हैं। शिक्षा, श्रम, किसान, जनजाति, सेवा, संस्कृति और राष्ट्र जागरण से जुड़े 100 से अधिक संगठन संघ की विचारधारा से प्रेरित होकर कार्य कर रहे हैं।
संघ के इतिहास में कई कठिन दौर आए। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संगठन पर प्रतिबंध लगा। 1975 में आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार ने संघ पर कार्रवाई की और हजारों स्वयंसेवकों को जेल भेजा गया। 1992 में बाबरी विवाद के बाद भी संघ प्रतिबंध का सामना कर चुका है। इसके बावजूद संगठन का ढांचा न केवल कायम रहा बल्कि समय के साथ और अधिक विस्तृत होता गया।
संघ की सबसे बड़ी विशेषता उसका अनुशासित नेतृत्व माना जाता है। डॉ. हेडगेवार से लेकर मोहन भागवत तक नेतृत्व परिवर्तन बिना किसी सार्वजनिक विवाद और गुटबाजी के हुआ। देश के अनेक राजनीतिक दल समय-समय पर टूटते रहे, लेकिन संघ में नेतृत्व को लेकर कभी खुला संघर्ष देखने को नहीं मिला।
संघ स्वयं को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का संगठन बताता है। शाखाओं में राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, सामाजिक समरसता और सेवा की भावना विकसित करने पर जोर दिया जाता है। यही कारण है कि प्राकृतिक आपदाओं, बाढ़, भूकंप, महामारी और अन्य संकटों के समय संघ के स्वयंसेवक बड़े स्तर पर राहत कार्यों में सक्रिय दिखाई देते हैं।
भारतीय राजनीति पर भी संघ का प्रभाव लगातार बढ़ा है। आज देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी सहित अनेक सामाजिक और शैक्षणिक संगठनों की वैचारिक जड़ें संघ से जुड़ी मानी जाती हैं। हालांकि संघ हमेशा स्वयं को प्रत्यक्ष राजनीति से अलग एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन बताता रहा है।
आलोचक संघ की विचारधारा पर सवाल उठाते हैं, जबकि समर्थक इसे राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा अभियान बताते हैं। लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है कि सौ वर्षों की यात्रा में संघ ने अपने संगठनात्मक ढांचे, अनुशासन और वैचारिक निरंतरता को बनाए रखा है।
जब देश में अनेक राजनीतिक दल, आंदोलन और संगठन समय के साथ टूटते-बिखरते रहे, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लगातार विस्तार करता रहा। शायद यही कारण है कि 100 वर्ष पूरे होने पर भी संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि भारतीय सार्वजनिक जीवन में एक प्रभावशाली संस्थान के रूप में देखा जाता है।


