खेतों से निकलेगा ईंधन, घटेगा तेल आयात और बढ़ेगी किसानों की आय
नई दिल्ली। दुनिया में ऑटोमोबाइल क्रांति की शुरुआत करीब 140 वर्ष पहले हुई थी, जब जर्मनी के इंजीनियर कार्ल बेंज ने पहली मोटर कार का निर्माण किया था। तब से लेकर आज तक परिवहन क्षेत्र में कई बड़े बदलाव आए हैं। अब दुनिया एक नई ऊर्जा क्रांति की ओर बढ़ रही है, जहां पेट्रोल और डीजल के विकल्प के रूप में इथेनॉल को भविष्य के ईंधन के तौर पर देखा जा रहा है। भारत भी इसी दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है और इथेनॉल आधारित ईंधन को आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने का बड़ा माध्यम मान रहा है।
देश में बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और विदेशी तेल पर निर्भरता को कम करने के लिए केंद्र सरकार इथेनॉल मिश्रित ईंधन को बढ़ावा दे रही है। इथेनॉल गन्ने, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है, जिसे पेट्रोल में मिलाकर वाहनों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे न केवल कच्चे तेल के आयात पर होने वाला भारी खर्च कम होगा, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इथेनॉल की बढ़ती मांग का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिलेगा। गन्ना और अन्य फसलों की खपत बढ़ने से किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकेगा। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और कृषि क्षेत्र में नए अवसर पैदा होंगे। साथ ही इथेनॉल को अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है, जिससे प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन में कमी आने की उम्मीद है।
भारत में ऑटोमोबाइल क्षेत्र भी तेजी से इस बदलाव को अपना रहा है। कई वाहन निर्माता कंपनियां फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक से लैस वाहन बाजार में उतार रही हैं, जो पेट्रोल और इथेनॉल दोनों पर चल सकते हैं। इसे भारतीय परिवहन व्यवस्था में आने वाले बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।


