लखनऊ। राजधानी के पॉश इलाके गोमती नगर स्थित डीएलएफ मायपैड एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। इस बार मामला लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए ) के ग्रीन एरिया नियमों से जुड़ा है। स्थानीय लोगों और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में आरोप लगाया जा रहा है कि परिसर की रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन हरित क्षेत्र (ग्रीन एरिया ) से जुड़े नियमों की खुलेआम अनदेखी कर रही है।
शहर में बढ़ते कंक्रीट के जंगल के बीच ग्रीन एरिया को पर्यावरण संरक्षण और नागरिकों के बेहतर जीवन के लिए अनिवार्य माना जाता है। यही वजह है कि एलडीए भवन निर्माण और आवासीय परियोजनाओं में निश्चित प्रतिशत भूमि को हरित क्षेत्र के रूप में सुरक्षित रखने का प्रावधान करता है। लेकिन आरोप है कि डीएलएफ मायपैड में इन्हीं नियमों को ताक पर रखकर ग्रीन एरिया के स्वरूप में बदलाव किए जा रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि ग्रीन एरिया से छेड़छाड़ हुई है तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि पर्यावरणीय मानकों पर भी सीधा प्रहार है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि आम नागरिक अपने मकान के बाहर एक फुट अतिरिक्त निर्माण कर ले तो नोटिस और कार्रवाई तुरंत हो जाती है, लेकिन बड़े और प्रभावशाली परिसरों के मामलों में प्रशासनिक मशीनरी की गति अचानक धीमी क्यों पड़ जाती है?
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या एलडीए अधिकारियों ने स्थल का निरीक्षण किया है? यदि शिकायतें पहले से मौजूद थीं तो उन पर क्या कार्रवाई हुई? और यदि कोई उल्लंघन नहीं हुआ तो संबंधित RWA और प्रबंधन इस पूरे विवाद पर खुलकर अपना पक्ष क्यों नहीं रख रहे?
सूत्रों के अनुसार, इस मुद्दे को लेकर कुछ निवासियों में असंतोष है और वे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि ग्रीन एरिया किसी संस्था या समिति की निजी संपत्ति नहीं बल्कि स्वीकृत नक्शे का अभिन्न हिस्सा होता है, जिसे मनमाने तरीके से बदला नहीं जा सकता।
यही कारण है कि अब यह विवाद केवल डीएलएफ मायपैड तक सीमित नहीं रह गया है। यह सवाल पूरे लखनऊ में संचालित बड़ी आवासीय परियोजनाओं की निगरानी व्यवस्था पर भी खड़ा हो गया है। क्या नियम केवल आम लोगों के लिए हैं या फिर बड़े नामों और हाई-प्रोफाइल परिसरों के लिए अलग व्यवस्था है?


