नई दिल्ली/हरारे। इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी उद्योग के लिए बेहद महत्वपूर्ण खनिज लिथियम को लेकर जिम्बाब्वे में चीन का बढ़ता प्रभाव अब अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है। एक ताजा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जिम्बाब्वे के लगभग 90 प्रतिशत लिथियम भंडार पर चीनी कंपनियों का नियंत्रण है, जिससे पर्यावरणीय नुकसान, स्थानीय समुदायों के शोषण और भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की चीन संबंधी चयन समिति की रिपोर्ट के अनुसार, जिम्बाब्वे में सक्रिय कई चीनी खनन कंपनियां खनिज संसाधनों पर व्यापक नियंत्रण स्थापित कर चुकी हैं। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि कमजोर प्रशासनिक निगरानी और भ्रष्टाचार के कारण कुछ कंपनियां बिना पर्याप्त जवाबदेही के काम कर रही हैं, जिससे पर्यावरण और स्थानीय आबादी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
खनन गतिविधियों के कारण जल स्रोतों के प्रदूषित होने, भूजल के अत्यधिक दोहन, धूल प्रदूषण और जैव विविधता को नुकसान पहुंचने जैसी समस्याएं सामने आई हैं। खनन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोगों ने स्वास्थ्य संबंधी खतरों और मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतें भी दर्ज कराई हैं। स्थानीय समुदायों का आरोप है कि कुछ कंपनियां विषैले रसायनों और भारी धातुओं का उपयोग कर रही हैं, जिससे नदियां और प्राकृतिक संसाधन प्रभावित हो रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि श्रमिकों को कई स्थानों पर असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। वहीं कुछ कंपनियों पर अधिकारियों को रिश्वत देकर नियमों से बचने और खनिज निर्यात जारी रखने के आरोप भी लगाए गए हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी तंत्र का अभाव है, जिससे उनकी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं।
इस बीच जिम्बाब्वे सरकार ने लिथियम कंसंट्रेट के निर्यात पर प्रतिबंध की समयसीमा को आगे बढ़ाने का फैसला किया है। सरकार अब देश के भीतर ही लिथियम की रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग को बढ़ावा देना चाहती है, ताकि खनिज संपदा का अधिक आर्थिक लाभ देश को मिल सके और रोजगार के नए अवसर पैदा हों। इस कदम का सबसे बड़ा असर चीन पर पड़ सकता है, क्योंकि जिम्बाब्वे के लिथियम निर्यात में उसकी हिस्सेदारी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।


